तुम मजदूर
सब चीजों के करता तुम
सब चीजों से दूर
तुम मजदूर
भारत को, रक्त श्रम से सिंचत कर
फिर भी माना गया तुमको वीर
कितने उजड़े सिंदूर
कितने सपने चकना चूर
इस विपदा में पैदल चलने को मजबूर
तुम मजदूर
कितने छाले पड़ गए चल चलकर
बाल वृद्ध युवकों ने दम तोड़ा भूख से अकुलाकर
थोड़ी सी रोटी - पानी की खातिर
घर जाने को व्याकुल कितने अधीर
तुम मजदूर
सर्प नवले पी गए तुम्हरा खून
विपदा में छोड़ दिया तुमको
ये कैसा भारत है
ये कैसे जन नायक है
कितने निर्लज्ज कितने पापी है
व्यथित कंठ से कहता हूं
कितना लज्जित हूं
कितना लज्जित हूं
हे भारत के निर्माता तुम मजदूर
कितने असहाय कितने मजबूर
सब चीजों के करता तुम
सब चीजों से दूर
तुम मजदूर