Sunday, January 1, 2023

 Fir vohi baat 

Fir vohi saans 

Roz roz istrah 

jeene se pareshan ho gya hu


Fir vohi baat 


Fir vohi saans 


Roz roz istrah 


jeene se pareshan ho gya hu



फिर वही बात, फिर वही साँस,

घुट-घुट के जीने का ये कैसा रिवाज़?

हर रोज़ खुद को दफनाता हूँ मैं—

जिंदा हूँ या लाश, नहीं कोई अंदाज़!


सुबह से पहले ही हार मान लेता हूँ,

रात को अपने ही सवालों में जलता हूँ,

ये कैसी ज़िंदगी है जो मुझसे ही पूछती है—

"तू जिंदा है?"… और मैं चुप रहता हूँ।


अब तो ये साँसें भी बगावत मांगती हैं,

ये रूह अपनी इजाज़त मांगती है,

तोड़ दूँ इस रोज़-रोज़ के सिलसिले को—

या खुद से ही अदालत मांगती है!


बहुत हुआ ये ढोंग-सा जीना,

बहुत हुआ ये चुप-चुप पीना,

या तो आग बनकर फट जाऊँगा मैं—

या फिर खुद को ही खत्म कर दूँगा 


Raakh takhalus ke sath

फिर वही बात, फिर वही साँस का हिसाब निकला,

ज़िंदगी तेरे नाम पर हर रोज़ अज़ाब निकला।


मैंने हर दिन को जिया जैसे कोई जंग हो,

पर हर जीत के बाद भी अंदर ख़राब निकला।


ये जो खामोश-सा चेहरा लिए फिरता हूँ मैं,

इसकी तह में ही मेरा सबसे बड़ा शोर निकला।


तोड़ दूँ रोज़ के इस सिलसिले की हर जंजीर,

मेरे अंदर ही कहीं एक इंक़लाब निकला।


अब ये सांसें भी मेरी मुझसे बगावत चाहें,

दिल का हर कोना जैसे खुला हिसाब निकला।


बहुत हुआ ये नकली-सा जीना, ये ढोंग सभी,

मैं जो सच बोल पड़ा—सबको जवाब निकला।


'राख़' समझा था जिसे तूने यूँ ही ठुकराकर,

वही चिंगारी बना… और आफ़ताब निकला