Monday, August 29, 2011
मेरे जाने से ही तुम घबराओगी
होंगे बहुत चाहने वाले तेरे
मुझसा कहाँ कोई तुम पाओगी
अभी चाहे मचलो इतराओ तुम
हमारे बिना ना तुम रह पाओगी
जमाना चाहे लाख रोके तुम्हे
मोहब्बत में मेरी चली आओगी
जब हम न होंगे ऐ सनम
ख्वाबों में भी तुम पछताओगी
मर जाऊंगा मै अगर तो कहीं
तुम भी ना फिर तो जी पाओगी
Sunday, August 14, 2011
तुम---एक अहसास
हो रागिनी तुम
हैं गीत मेरे
उनकी आवाज़ हो तुम
हैं शब्द मेरे
उनकी पहचान हो तुम
है ध्वनि मेरी
प्रतिध्वनी हो तुम
हैं भाव मेरे
उनकी संकल्पना हो तुम
हैं स्वप्न मेरे
उन स्वप्नों का नाम हो तुम
हैं अधर मेरे
उनकी मुस्कान हो तुम
हैं लक्ष्य मेरे
उनका मार्ग हो तुम
हैं विचार मेरे
उनकी प्रेरणा हो तुम
हूँ जीवित मै
हो जीने का अहसास तुम
है जीवन मेरा
हो इसकी साँस तुम
मेरे जीवन की धूप में
सुनहरी छाया हो तुम
मेरे ढलते जीवन की
एकमात्र आशा हो तुम
मेरे जीवन समर में
अकेली संगिनी हो तुम
मेरी हर उलझन का
एक सुलझा हल हो तुम
मेरी हर उपलब्धि से बढ़कर
सबसे बड़ी उपलब्धि हो तुम
मेरी हर ख़ुशी से बढकर
सबसे बड़ी ख़ुशी हो तुम
मेरे घर-मंदिर की
देवी हो तुम
मेरी पूजा मेरी आस्था
मेरा विस्वास हो तुम
मेरी साँस मेरी शक्ति
मेरे जीने का आधार हो तुम
और सबसे बढ़कर
मेरी आत्मा मेरा संसार हो तुम
.................कुमार धर्मेन्द्र
माँ
हम भारतीय कुछ विशेष हैं....
हम भारतीय कुछ विशेष हैं
शक्ति नहीं है जिनमे
वो नेता हैं विशेष हैं
शरहद के के सिपाही हैं
फिर भी अवशेष हैं
ये b.tech जीवन है....
एक दूजे से अनजाने थे
खुलकर मिलने में भी
हम सब थोडा सकुचाते थे
नाम पूछते बतलाते थे
फिर थोडा सा मुस्काते थे
निश्चल कोमल मन से
अपने भाव जगाते थे
सुबह सुबह उठकर मेस में
हाल चाल बतियाते थे
बस से कॉलेज तक
हम सब संग में जाते थे
हर assignment छाप छाप कर
अपना ज्ञान बढ़ाते थे
पहले जाने वाली बस में
लद लद कॉलेज से जाते थे
mass bunk करके हम सब
कुछ पढ़ाकुओं को समझाते थे
कॉलेज ना जाने पर हम सब
खूब proxy लगवाते थे
कुछ का नाम बिगाड़ा करते
कुछ की मौज उड़ाते थे
जन्म दिन के मौके पर
लातों से भूत बनाते थे
VP की class में हम सब
खर्राटे खूब लगाते थे
VT को देख देख
मन ही मन हर्षाते थे
मतभेद कभी जो बढ़ गये
खुद ही सुलझाते थे
एक दूजे से घुल मिल
माहौल को मस्त बनाते थे
सुट्टे पे सुट्टा हम सब
खूब उड़ाते थे
हर ख़ुशी के मौके पर
bear पे bear चढाते थे
exam समय आने पर
खुद को रात रात जगाते थे
समझ नहीं आने पर
"मुझे पढ़ा दे " का नारा खूब लगाते थे
जैसे तैसे exam पास कर
यूहीं समय बितातते थे
रात में खुद को नीद ना आने पर
जोर जोर से चिल्लाते थे
अब placement time आया है
tension को संग में लाया है
रात रात घिसते हैं
फिर भी कहीं नहीं हो पाया है
कुछ की लग गयी है
कुछ की लगने वाली है
नौकरी की चिंता क्यूँ करते हो
वो तो अपनी घरवाली है
आज नहीं तो कल
लग ही जाएगी
कुछ को google कुछ को tcs
यारों मिल ही जाएगी
ये मौज मस्ती के पल
फिर ना कभी आएंगे
चार बरस जीवन के ये
सबसे सुखमय कहलाएँगे
बीबी होगी बच्चे होंगे
उनको खूब बताएँगे
चार बरस जीवन के
यारों वापस कभी नहीं आयेंगे
बूढ़े भारत को कोई नयी जवानी दे दे
Friday, August 12, 2011
हे राष्ट्र तुम्हे प्रणाम
हे राष्ट्र तुम्हे प्रणाम
हे राष्ट्र तुम्हे प्रणाम
गाता हूँ तेरी अमरता का गुन गान
हे राष्ट्र तुम्हे प्रणाम
पर किन शब्दों से कह दूं
मै तुझको महान
हे राष्ट्र तुम्हे प्रणाम
हे राष्ट्र तुम्हे प्रणाम
भूखे सोते जहाँ इंसान
रबड़ी मलाई खाते श्वान
कैसे कह दूं तुझको महान
हे राष्ट्र तुम्हे प्रणाम
सौ-सौ जाति सौ-सौ धर्म
बटे पड़े हैं यहाँ भगवान्
रोज यहाँ दंगे होते
हर क्षण बनते मरघट शमशान
कैसे कह दूं तुझको महान
हे राष्ट्र तुम्हे प्रणाम
हर बम धमाके में जहां
मरती आम जनता आम इंसान
झूठी सांत्वना आश्वासन देकर
बनते नेता यहां महान
कैसे कह दूं तुझको महान
हे राष्ट्र तुम्हे प्रणाम
भगत आजाद बिस्मिल महान
फीके पड़े हैं उनके बलिदान
घट घट पे जो घोटाले करते
होता यहाँ उनका सम्मान
कैसे कह दूं तुझको महान
हे राष्ट्र तुम्हे प्रणाम
चंद पढ़े लिखों को छोड़ो
बाकी जनता अनपढ़ अनजान
न बिजली पानी उसपे क़र्ज़ महान
आत्महत्या कर रहे किसान
कैसे कह दूं तुझको महान
हे राष्ट्र तुम्हे प्रणाम
लोकतंत्र की रक्षा की खातिर
कानून बनाया बड़ा महान
मुजरिम बहार घुमा करते
बस पिसते हैं बेबस इंसान
कैसे कह दूं तुम्हे महान
हे राष्ट्र तुम्हे प्रणाम
कहते हैं भारत महान
खुद जन्मे थे यहाँ भगवान्
चंद पैसों की खातिर अब
बदले जाते हैं भगवान्
कैसे कह दूं तुझको महान
हे राष्ट्र.......
धर्मेन्द्र
मैंने रातों का भारत देखा
बन के आवारा मै
रातों को भारत देखा
गली कुचों पे सड़कों पे
मैंने शमशान सा सन्नाटा देखा
A .C . के बड़े घरों में
लोगों को सोते देखा
सड़क किनारे सोतों को
कारों से कुचले देखा
सूखे हड्डी के पिंजड़ों को
मैंने जीवन खोते देखा
रोटी के एक कतरे की खातिर
कुत्तों औ इंसानों को लड़ते देखा
वहीँ सामने गलियारे में
सुन्दर मयखाना देखा
लाखों का वारा न्यारा होता
ये घंटे भर में देखा
मयखाने में जाती नगर वधू पे
मैंने लाखों लूटते देखा
वहीँ किनारे पड़े आकुलाते
भूखों को मैंने दुरियाते देखा
कुछ मासूमों को मैंने
राहों में भटकते देखा
कुछ को रोते देखा
कुछ को बिकते देखा
सड़कों पे शहजादों को
मैंने खूब पीते देखा
वहीँ बड़ी कारों में अबला की
अस्मत को लुटते देखा
कुछ सरकार के रखवालों को
मैंने मुंह घुमाते देखा
कुछ को पैसे लेते देखा
कुछ को पीठ थपथपाते देखा
वहीँ सामने चौराहे पे
मैंने गाँधी का पुतला देखा
मजबूरी का नाम महात्मा गाँधी
ये उसको कहते देखा
रातों को अंधियारे में
मैंने हर मंजर देखा
कहीं जश्न तो कहीं
मातम का माहौल को देखा
सच कहूं तो मैंने
रातों का भारत देखा
और इस भारत को मैंने
यूँही आगे बढते देखा
मैंने रातों का भारत देखा...
गर्व करूँ किस भारत पर
जब मैंने अतीत के भारत को
इस भारत का चमचा देखा
संस्कारों को मिटते देखा
अच्छाई का दम घुटते देखा
हाँ उस गौरवशाली भारत को
रातों में मरते देखा
हाँ मैंने रातों का भारत देखा
हाँ मैंने रातों का भारत देखा
...............................धर्मेन्द्र