तेरी ख़ुशबू की ये चाहत कम नहीं होती,
हर फूल में भी तेरी खुशबू कम नहीं होती।
मीलों चला हूँ मैं तुझसे मिलने की ख़ातिर,
पर ये कमबख़्त दूरी कम नहीं होती!
ढलते हुए सूरज से मैंने ये सीखा है—
हर रोज़ उजालों से मुलाक़ात नहीं होती।
समंदर की रेत पे लिखा तेरा नाम हज़ारों बार,
लहरों की साज़िश से मोहब्बत कम नहीं होती!
हर एक तारे से पूछा है तेरा ही पता मैंने,
पर इन खामोशियों से कोई बात नहीं होती।
सर्द स्याह रात… और ये जलती हुई सिगरेट,
यूँ राख उड़ाने से भी राहत नहीं होती!
सुबह की पहली किरण ने ये समझाया मुझको—
हर रोज़ नई शुरुआत आसान नहीं होती।
दिन तो निकल जाता है लोगों की भीड़ में,
पर दिल की ये तन्हाई कम नहीं होती!
सुनो—
मोहब्बत अगर सच्ची हो, तो अधूरी ही रहती है…
क्योंकि मुकम्मल इश्क़ में कोई बात नहीं होती!!
‘राख’ तेरी तलाश में जलता ही रहा मैं,
इस आग में जलने से भी हसरत कम नहीं होती
🔥 आक्रामक मंचीय ग़ज़ल 🔥
तेरी ख़ुशबू की ये आदत कम नहीं होती,
ज़ख़्म चाहे जितने भरें—ये जलन कम नहीं होती!
मीलों चला हूँ मैं तेरे झूठे वादों के पीछे,
पर सच ये है—अब कोई भी राह आसान नहीं होती!
ढलते सूरज से मैंने ये सबक चुरा लिया है—
हर रोज़ उजाले की औक़ात नहीं होती!
समंदर की रेत पे लिखा तेरा नाम हज़ार बार,
पर लहरों से लड़ने की मेरी ज़िद कम नहीं होती!
हर एक तारे से पूछूँ मैं तेरा ही पता,
और तू कहती है—मुझसे बात नहीं होती?!
सर्द स्याह रात… ये धुआँ, ये सिगरेट, ये मैं—
जलते रहने से भी दिल की बग़ावत कम नहीं होती!
सुनो—
तुम मोहब्बत को खेल समझते रहे…
और यहाँ हर हार के बाद भी इबादत कम नहीं होती!
सुबह की पहली किरण भी अब सवाल करती है—
क्या हर तलाश की कोई मंज़िल ज़रूरी होती?
दिन निकलता है, लोग हँसते हैं, दुनिया चलती है—
पर अंदर जो मरता है… उसकी कोई मौत नहीं होती!
और आख़िरी बात—ध्यान से सुनना…
मोहब्बत अगर सच्ची हो, तो तोड़ती है, बनाती नहीं…
क्योंकि असली इश्क़ में कोई राहत नहीं होती!!
‘राख’ मैं जलकर भी तुझे भूल जाऊँ—मुमकिन नहीं,
इस आग से भागने की भी इजाज़त नहीं होती…