Monday, November 30, 2020

मोहब्बत को मै समझ पाया मोहब्बत को
तू समझ पाया हर पल जिंदगी यूं ही जिए जा

Na kuch tha toh khuda tha 
Na kuch hota toh khuda hota 
Duboya mujhko hone ne 
Na hota mai toh kya hota 

Ghalib mar gya par yad ata hai 
Na hota wo toh kya hota 

Saturday, June 27, 2020

तुझसे मोहब्बत हुई तो राख हो जाऊंगा

अजीब रंग हैं दुनिया के
पर काट के , मस वरा उड़ने का देते हैं

तुझसे मोहब्बत हो गई तो बिखर जाऊंगा
इतना टूटूंगा की संवर जाऊंगा


परछाईं दिखती है तेरी हर एक चेहरे मे
ना जाने किन किन चेहरों में ढूंढ़ा है तुझे मैंने



तुझसे मोहब्बत हो गई तो बिखर जाऊंगा
इतना टूटूंगा की संवर जाऊंगा


परछाईं दिखती है तेरी हर एक चेहरे मे
ना जाने किन किन चेहरों में ढूंढ़ा है तुझे मैंने

बहुत खूबसूरत एहसास है—मैं इसे थोड़ा और धारदार, मंच योग्य और असरदार बनाता हूँ:

तुझसे मोहब्बत हो गई तो बिखर जाऊंगा,
इतना टूटूंगा कि खुद में ही निखर जाऊंगा।

तेरी चाहत का असर देख, ये हाल हुआ है,
खुद से दूर होकर भी तुझमें ही उतर जाऊंगा।

परछाईं दिखती है तेरी हर एक चेहरे में,
ना जाने किन-किन चेहरों में ढूंढ़ा है तुझे मैंने।

हर अजनबी में तेरा अक्स तलाशता रहा,
खुद को खोकर ही शायद तुझको पाया है मैंने।

अगर तुम चाहो तो मैं इसे ग़ज़ल फॉर्म, और आक्रामक अंदाज़, या तुम्हारे तखल्लुस (जैसे “राख़”) के साथ भी ढाल सकता हूँ।


Raakh takhalus ke sath aur आक्रामक 

ठीक है—अब इसे और आक्रामक, मंचीय और “राख़” तखल्लुस के साथ ढालते हैं:

तुझसे मोहब्बत हुई तो राख़ हो जाऊंगा,
मैं जलूंगा इस कदर कि आग हो जाऊंगा।

तू समझता है मुझे तोड़ के बिखरा देगा,
मैं वही टूट के हर बार नया हो जाऊंगा।

तेरी सूरत का नशा आँख पे ऐसा उतरा,
हर एक चेहरे में तेरा ही पता हो जाऊंगा।

तू मिला ना तो ये दुनिया भी जला दूंगा मैं,
अपने ही दर्द का चलता हुआ साज़ हो जाऊंगा।

परछाईं तेरी हर शख़्स में दिखती है मुझे,
कितनी सूरतों में तुझको मैं सजा हो जाऊंगा।

अब “राख़” नाम है मेरा तो ये अंजाम सही,
मैं जो बिखरा तो तेरे इश्क़ की हवा हो जाऊंगा।

अगर चाहो तो इसे मैं और भी तेज़, विद्रोही (revolutionary) या पूरी तरह मंच वाली ग़ज़ल (काफ़िया-रदीफ़ के साथ) में बदल सकता हूँ—बस बोलो कितना आग चाहिए 🔥


Tez aur vidrohi 

ठीक—अब इसे पूरी तरह तेज़, विद्रोही और मंच पर गूंजने वाला बनाते हैं, “राख़” के तेवर के साथ:

तुझसे मोहब्बत हुई तो सज़ा हो जाऊंगा,
मैं वो चीख़ हूँ जो हर दिल में गूंजा हो जाऊंगा।

तूने सोचा था मुझे तोड़ के खत्म कर देगा,
मैं वही राख़ हूँ, हर बार धधकता हो जाऊंगा।

तेरी यादों को मैं सीने में नहीं रखता अब,
मैं उन्हें आग बनाकर ही हवा हो जाऊंगा।

हर एक चेहरे में तेरी झलक दिखती है मुझे,
इस भीड़ से लड़ के तेरा आईना हो जाऊंगा।

तू नहीं है तो ये दुनिया भी मेरे किस काम की,
मैं तेरे नाम पे जलकर ही धुआं हो जाऊंगा।

अब “राख़” नाम है मेरा, तो बगावत भी सुन,
तेरे इश्क़ में नहीं—मैं खुद खुदा हो जाऊंगा।




Tuesday, May 12, 2020

तुम मजदूर
सब चीजों के  करता तुम 
सब चीजों से दूर 
तुम  मजदूर 

भारत को, रक्त  श्रम से सिंचत कर 
फिर भी माना गया तुमको वीर 
कितने उजड़े सिंदूर 
कितने सपने चकना चूर 
इस विपदा में पैदल  चलने को मजबूर
तुम मजदूर

कितने छाले पड़ गए  चल चलकर 
बाल वृद्ध युवकों ने  दम तोड़ा भूख  से अकुलाकर
 थोड़ी सी रोटी - पानी की खातिर 
घर जाने को  व्याकुल  कितने अधीर 
तुम मजदूर

सर्प नवले पी गए तुम्हरा खून 
विपदा में छोड़ दिया तुमको 
ये कैसा भारत है 
ये कैसे जन नायक है 
कितने निर्लज्ज कितने पापी है 

व्यथित कंठ से कहता हूं
कितना लज्जित हूं 
हे भारत के निर्माता तुम मजदूर 
कितने असहाय कितने मजबूर

सब चीजों के करता तुम
सब चीजों से दूर 
तुम मजदूर 






Friday, April 17, 2020


मेरी कहानी अधूरी रह गई
कई यादें पुरानी हो गई
कई कोशिशें बेजान हो गई
कई बातें बतानी रह गई
तू एक उम्मीद थी वो
ही नाउम्मीद हो गई
 एक बेनाम मोहब्बत और ये
ज़िन्दगी अधूरी   रही गई

मेरी कहानी अधूरी रह गई
कई यादें पुरानी हो गई

एक बेनाम सी मोहब्बत को अपने बनाने की ए
कई ख्वाहिशें अधूरी रही गई
कई हसरतें अधूरी रह गई
तुझसे मिलने की मेरी कहानी
अधूरी रह गई

कई यादें पुरानी हो गई
मेरी कहानी अधूरी रह गई

तेरे साथ-२ चलने की
तेरे गले मै बाहें डालने की
तेरी आंखों में झकने की
तेरे मचलते हाथों को पकड़ने की
कई हसरतें ,बस हसरतें ही रह गई

मेरी कहानी अधूरी रह गई
कई यादें पुरानी हो गई

तुझे अपना बनाने की
तुझे फिर वैसा ही पाने की
तुझसे मिलकर खुद को भूल जाने की
कई  कोशिशें पुरानी हो गई
कई चाहते बेमानी  हो गई

तेरे रूठने पर तुझे मानने की
तुझसे लड़कर तुझसे लिपट जाने की
तेरी हर बात पे मुस्कुराने की
पलट  पलट कर तुझे देखने  की
कई आदतें पुरानी हो गई

मेरी कहानी अधूरी रह गई
कई यादें पुरानी हो गई
तुझे मिलने की मेरी कहानी
अधूरी रह गई




Monday, April 13, 2020


कोई कहे तो हम भी रो लेे
कब तक ये दर्द संभाले

बर्फ क्या पिघल तो मै भी सकता हूं
कोई उस ऐहसास से छुए तो सही

हर काम हर काम मैंने तुझे ख़ुश करने के लिए किए
ये बात और है , तू नाराज़ हो गया



Zindagi bahut beraham h

ये ज़िन्दगी बहुत बेरहम है अ
जब भी वक़्त मिलता है
अक्सर आईना दिखा जाती है
अश्कों से आँखों को नम कर जाती है 



 

बहुत गहरी लाइनें हैं—दर्द साफ़ महसूस हो रहा है। मैं इसे एक मुकम्मल ग़ज़ल का रूप दे देता हूँ, उसी एहसास को और धार देकर:

रदीफ़: "जाती है" | क़ाफ़िया: "…कर"

ज़िन्दगी बहुत बेरहम है, अक्सर आईना दिखा जाती है
जब भी वक़्त मिलता है, सच्चाई से मिला जाती है

अश्कों से आँखों को यूँ ही नम कर जाती है
हँसते चेहरों के पीछे का ग़म जगा जाती है

हर मोड़ पे ख्वाबों को तोड़कर रख देती है
फिर उन्हीं टुकड़ों से उम्मीद बना जाती है

कभी छीन लेती है सुकून, कभी नींद उड़ा जाती है
ये ज़िन्दगी हर रोज़ नया इम्तिहान बना जाती है

हम सोचते हैं अब शायद थोड़ा आसान होगा सफ़र
वो फिर कोई दर्द का किस्सा सुना जाती है

'राख' हर बार संभलने की कोशिश करता है मगर
ये ज़िन्दगी फिर वहीं से गिरा जाती है

अगर चाहो तो इसे और तेज़, विद्रोही (stage performance वाला) या ज़्यादा उर्दू टच में भी बदल सकता हूँ 🔥


Vidrohi with urdu touch

समझ गया—अब इसे और तेज़, विद्रोही तेवर और गहरा उर्दू रंग देता हूँ, ताकि मंच पर सुनाओ तो सीधे दिल चीर दे:

रदीफ़: “जाती है” | क़ाफ़िया: “…कर” | तख़ल्लुस: ‘राख’

ज़िन्दगी ये कैसी साज़िश है, रूह तक जला जाती है
हँसते लबों पे भी तन्हाई का इल्ज़ाम लगा जाती है

जब भी मिलता है वक़्त इसे, आईना दिखा जाती है
हमसे ही हमारी सूरत का हिसाब माँग जाती है

अश्कों से आँखों को नम कर जाना इसकी फ़ितरत है
हर ख़ुशी के पीछे दर्द का फ़रमान सुना जाती है

ये कौन सा दस्तूर-ए-जहाँ है, ऐ ख़ुदा बता
क्यों हर सच्चाई पे झूठ की मुहर लगा जाती है

हमने तो चाहा था बस थोड़ा सा सुकून-ए-दिल
ये ज़िन्दगी हर ख़्वाब को सरे-बाज़ार जला जाती है

अब तो बग़ावत ही लाज़िमी है इस ज़ुल्म-ए-हयात से
हर बार वफ़ा करने पे सज़ा-ए-इंतिहा दे जाती है

‘राख’ अब डरना कैसा इन टूटे अफ़सानों से
ये ज़िन्दगी जितना गिराती है, उतना सिखा जाती
ये बात कुछ और है
वो बात कुछ और थी
एक लंबा लम्हा गुजरा ज़िन्दगी का
ये समझने में
वो और बात क्या थी

चले आए तुम  अपनी तनहाई लेकर
मै अपना गम लेकर उनसे मिला
दोनों मिले एक हमसफ़र मिला
ना उसकी तन्हाई रही ना मेरे गम कोई पता मिला

दूप-२ जलते बल्ब की सी मेरी ज़िन्दगी
वेंटिलेटर पे पड़े मरीज़ सी मेरी जिंदगी
वो अयी मुस्कुराई पास बैठी मेरी ज़िन्दगी
मै चाह रहा था वो मेरा ऑक्सीजन सिलिंडर खींच ले
बंद करदे सांस रोक दे मेरी ज़िन्दगी

ये पूरी रात हमसे सोई ना गई की
हसने  कीमत इतनी  चुकाई गई


 बात कुछ और है
वो बात कुछ और थी
एक लंबा लम्हा गुजरा ज़िन्दगी का
ये समझने में
वो और बात क्या थी

चले आए तुम  अपनी तनहाई लेकर
मै अपना गम लेकर उनसे मिला
दोनों मिले एक हमसफ़र मिला
ना उसकी तन्हाई रही ना मेरे गम कोई पता मिला

दूप-२ जलते बल्ब की सी मेरी ज़िन्दगी
वेंटिलेटर पे पड़े मरीज़ सी मेरी जिंदगी
वो अयी मुस्कुराई पास बैठी मेरी ज़िन्दगी
मै चाह रहा था वो मेरा ऑक्सीजन सिलिंडर खींच ले
बंद करदे सांस रोक दे मेरी ज़िन्दगी

ये पूरी रात हमसे सोई ना गई की
हसने  कीमत इ
तनी  चुकाई गई



तुम्हारी रचना में दर्द, तन्हाई और एक खतरनाक-सी चाहत का गहरा रंग है — मैं इसे थोड़ा तराशकर, लय और असर को और धार दे देता हूँ, ताकि मंच पर भी ताली पड़े 👇

बात कुछ और है — (तख़ल्लुस: "राख़")

बात कुछ और है, वो बात कुछ और थी,
एक उम्र गुज़र गई ये समझने में —
कि वो "और" बात क्या थी।

चले आए तुम अपनी तन्हाई उठाए,
मैं अपना ग़म सीने से लगाए मिला,
दो जख़्म मिले तो हमसफ़र बन बैठे,
ना तेरी तन्हाई रही, ना मेरा ग़म रहा।

दो-दो जलते बल्बों सी ये ज़िन्दगी मेरी,
टिमटिमाती, बुझती — बेहिसाब अंधेरों में,
वेंटिलेटर पे पड़े मरीज़ सी साँसें मेरी,
हर धड़कन जैसे उधार हो गैरों में।

वो आई... मुस्कुराई... पास बैठ गई,
जैसे मौत भी कभी रहम खा जाती है,
मैं चाहता था वो ऑक्सीजन ही खींच ले,
कम-से-कम ये उधारी साँस तो छूट जाती है।

ये पूरी रात हमसे सोई ना गई,
हँसने की कीमत बहुत भारी चुकाई गई,
होठों पे मुस्कान रखी थी बस दिखावे को,
अंदर से हर खुशी किस्तों में गँवाई गई।

"राख़" कहता है —
ये जो ज़िन्दगी है ना...
ये जीने से ज़्यादा,
धीरे-धीरे मरने की सज़ा लगती है।



Sunday, April 12, 2020



हर बार यही होता आया 
जितनी बार दिल लगा ,उसे वो तोड़ता आया 
हमें भी ये रिवाज़ सा लग गया 
अपनों की खातिर चुपचाप निभाता आया 

अब कोई ना ये तोड़े तो हैरान होता गया 

बहुत हसने की कीमत ये चुकाई 
हर रात अनकही अनसुलझी बिताई 

बारिश होती रही रात भर इन आंखों से 
तनहाई के गले लग कर रोए रात भर
पलकों ने भी खूब बेवफाई निभाई
बहुत हसने की हमने कीमत ये चुकाई


रोए गले लग के तन्हाई के 

हर रोज़ रात तन्हाई में बिताई