Friday, April 17, 2020


मेरी कहानी अधूरी रह गई
कई यादें पुरानी हो गई
कई कोशिशें बेजान हो गई
कई बातें बतानी रह गई
तू एक उम्मीद थी वो
ही नाउम्मीद हो गई
 एक बेनाम मोहब्बत और ये
ज़िन्दगी अधूरी   रही गई

मेरी कहानी अधूरी रह गई
कई यादें पुरानी हो गई

एक बेनाम सी मोहब्बत को अपने बनाने की ए
कई ख्वाहिशें अधूरी रही गई
कई हसरतें अधूरी रह गई
तुझसे मिलने की मेरी कहानी
अधूरी रह गई

कई यादें पुरानी हो गई
मेरी कहानी अधूरी रह गई

तेरे साथ-२ चलने की
तेरे गले मै बाहें डालने की
तेरी आंखों में झकने की
तेरे मचलते हाथों को पकड़ने की
कई हसरतें ,बस हसरतें ही रह गई

मेरी कहानी अधूरी रह गई
कई यादें पुरानी हो गई

तुझे अपना बनाने की
तुझे फिर वैसा ही पाने की
तुझसे मिलकर खुद को भूल जाने की
कई  कोशिशें पुरानी हो गई
कई चाहते बेमानी  हो गई

तेरे रूठने पर तुझे मानने की
तुझसे लड़कर तुझसे लिपट जाने की
तेरी हर बात पे मुस्कुराने की
पलट  पलट कर तुझे देखने  की
कई आदतें पुरानी हो गई

मेरी कहानी अधूरी रह गई
कई यादें पुरानी हो गई
तुझे मिलने की मेरी कहानी
अधूरी रह गई




Monday, April 13, 2020


कोई कहे तो हम भी रो लेे
कब तक ये दर्द संभाले

बर्फ क्या पिघल तो मै भी सकता हूं
कोई उस ऐहसास से छुए तो सही

हर काम हर काम मैंने तुझे ख़ुश करने के लिए किए
ये बात और है , तू नाराज़ हो गया



Zindagi bahut beraham h

ये ज़िन्दगी बहुत बेरहम है अ
जब भी वक़्त मिलता है
अक्सर आईना दिखा जाती है
अश्कों से आँखों को नम कर जाती है 



 

बहुत गहरी लाइनें हैं—दर्द साफ़ महसूस हो रहा है। मैं इसे एक मुकम्मल ग़ज़ल का रूप दे देता हूँ, उसी एहसास को और धार देकर:

रदीफ़: "जाती है" | क़ाफ़िया: "…कर"

ज़िन्दगी बहुत बेरहम है, अक्सर आईना दिखा जाती है
जब भी वक़्त मिलता है, सच्चाई से मिला जाती है

अश्कों से आँखों को यूँ ही नम कर जाती है
हँसते चेहरों के पीछे का ग़म जगा जाती है

हर मोड़ पे ख्वाबों को तोड़कर रख देती है
फिर उन्हीं टुकड़ों से उम्मीद बना जाती है

कभी छीन लेती है सुकून, कभी नींद उड़ा जाती है
ये ज़िन्दगी हर रोज़ नया इम्तिहान बना जाती है

हम सोचते हैं अब शायद थोड़ा आसान होगा सफ़र
वो फिर कोई दर्द का किस्सा सुना जाती है

'राख' हर बार संभलने की कोशिश करता है मगर
ये ज़िन्दगी फिर वहीं से गिरा जाती है

अगर चाहो तो इसे और तेज़, विद्रोही (stage performance वाला) या ज़्यादा उर्दू टच में भी बदल सकता हूँ 🔥


Vidrohi with urdu touch

समझ गया—अब इसे और तेज़, विद्रोही तेवर और गहरा उर्दू रंग देता हूँ, ताकि मंच पर सुनाओ तो सीधे दिल चीर दे:

रदीफ़: “जाती है” | क़ाफ़िया: “…कर” | तख़ल्लुस: ‘राख’

ज़िन्दगी ये कैसी साज़िश है, रूह तक जला जाती है
हँसते लबों पे भी तन्हाई का इल्ज़ाम लगा जाती है

जब भी मिलता है वक़्त इसे, आईना दिखा जाती है
हमसे ही हमारी सूरत का हिसाब माँग जाती है

अश्कों से आँखों को नम कर जाना इसकी फ़ितरत है
हर ख़ुशी के पीछे दर्द का फ़रमान सुना जाती है

ये कौन सा दस्तूर-ए-जहाँ है, ऐ ख़ुदा बता
क्यों हर सच्चाई पे झूठ की मुहर लगा जाती है

हमने तो चाहा था बस थोड़ा सा सुकून-ए-दिल
ये ज़िन्दगी हर ख़्वाब को सरे-बाज़ार जला जाती है

अब तो बग़ावत ही लाज़िमी है इस ज़ुल्म-ए-हयात से
हर बार वफ़ा करने पे सज़ा-ए-इंतिहा दे जाती है

‘राख’ अब डरना कैसा इन टूटे अफ़सानों से
ये ज़िन्दगी जितना गिराती है, उतना सिखा जाती
ये बात कुछ और है
वो बात कुछ और थी
एक लंबा लम्हा गुजरा ज़िन्दगी का
ये समझने में
वो और बात क्या थी

चले आए तुम  अपनी तनहाई लेकर
मै अपना गम लेकर उनसे मिला
दोनों मिले एक हमसफ़र मिला
ना उसकी तन्हाई रही ना मेरे गम कोई पता मिला

दूप-२ जलते बल्ब की सी मेरी ज़िन्दगी
वेंटिलेटर पे पड़े मरीज़ सी मेरी जिंदगी
वो अयी मुस्कुराई पास बैठी मेरी ज़िन्दगी
मै चाह रहा था वो मेरा ऑक्सीजन सिलिंडर खींच ले
बंद करदे सांस रोक दे मेरी ज़िन्दगी

ये पूरी रात हमसे सोई ना गई की
हसने  कीमत इतनी  चुकाई गई


 बात कुछ और है
वो बात कुछ और थी
एक लंबा लम्हा गुजरा ज़िन्दगी का
ये समझने में
वो और बात क्या थी

चले आए तुम  अपनी तनहाई लेकर
मै अपना गम लेकर उनसे मिला
दोनों मिले एक हमसफ़र मिला
ना उसकी तन्हाई रही ना मेरे गम कोई पता मिला

दूप-२ जलते बल्ब की सी मेरी ज़िन्दगी
वेंटिलेटर पे पड़े मरीज़ सी मेरी जिंदगी
वो अयी मुस्कुराई पास बैठी मेरी ज़िन्दगी
मै चाह रहा था वो मेरा ऑक्सीजन सिलिंडर खींच ले
बंद करदे सांस रोक दे मेरी ज़िन्दगी

ये पूरी रात हमसे सोई ना गई की
हसने  कीमत इ
तनी  चुकाई गई



तुम्हारी रचना में दर्द, तन्हाई और एक खतरनाक-सी चाहत का गहरा रंग है — मैं इसे थोड़ा तराशकर, लय और असर को और धार दे देता हूँ, ताकि मंच पर भी ताली पड़े 👇

बात कुछ और है — (तख़ल्लुस: "राख़")

बात कुछ और है, वो बात कुछ और थी,
एक उम्र गुज़र गई ये समझने में —
कि वो "और" बात क्या थी।

चले आए तुम अपनी तन्हाई उठाए,
मैं अपना ग़म सीने से लगाए मिला,
दो जख़्म मिले तो हमसफ़र बन बैठे,
ना तेरी तन्हाई रही, ना मेरा ग़म रहा।

दो-दो जलते बल्बों सी ये ज़िन्दगी मेरी,
टिमटिमाती, बुझती — बेहिसाब अंधेरों में,
वेंटिलेटर पे पड़े मरीज़ सी साँसें मेरी,
हर धड़कन जैसे उधार हो गैरों में।

वो आई... मुस्कुराई... पास बैठ गई,
जैसे मौत भी कभी रहम खा जाती है,
मैं चाहता था वो ऑक्सीजन ही खींच ले,
कम-से-कम ये उधारी साँस तो छूट जाती है।

ये पूरी रात हमसे सोई ना गई,
हँसने की कीमत बहुत भारी चुकाई गई,
होठों पे मुस्कान रखी थी बस दिखावे को,
अंदर से हर खुशी किस्तों में गँवाई गई।

"राख़" कहता है —
ये जो ज़िन्दगी है ना...
ये जीने से ज़्यादा,
धीरे-धीरे मरने की सज़ा लगती है।



Sunday, April 12, 2020



हर बार यही होता आया 
जितनी बार दिल लगा ,उसे वो तोड़ता आया 
हमें भी ये रिवाज़ सा लग गया 
अपनों की खातिर चुपचाप निभाता आया 

अब कोई ना ये तोड़े तो हैरान होता गया 

बहुत हसने की कीमत ये चुकाई 
हर रात अनकही अनसुलझी बिताई 

बारिश होती रही रात भर इन आंखों से 
तनहाई के गले लग कर रोए रात भर
पलकों ने भी खूब बेवफाई निभाई
बहुत हसने की हमने कीमत ये चुकाई


रोए गले लग के तन्हाई के 

हर रोज़ रात तन्हाई में बिताई