Tuesday, September 13, 2011

हम भी तो सिपाही हैं

जय हिंद हिंद जय हिंद हिंद
हर जश्न ए आज़ादी में
कहने को सौ बार कहेंगे
मिलकर साथ लड़ेंगे साथ बढ़ेंगे
जश्न ए आज़ादी में क्या ऐसा प्रण करेंगे

हम भी तो सिपाही हैं
क्या इसका हम अभिमान करेंगे
सरहद पे मिटने वालों जैसा
क्या हम भी कुछ काम करेंगे

वो तो अपनी रण भूमि में
जी जान से लड़े हैं लड़ जायेंगे
क्या अपनी कर्म भूमि में हम भी
वैसा कुछ उत्तम काम करेंगे

चोरी नहीं घोटाला नहीं
सच्चाई से काम करेंगे
क्या वीर सपूतों जैसा
इस जग में कुछ नाम करेंगे

जाती धर्म भेदभाव मिटे सब
क्या कुछ ऐसा कर पायेगे
जश्न ए आज़ादी में क्या
हर बार ये संकल्प दोहराएंगे

हर डाली में फूल खिलेंगे
हर ओर लोग मुस्कायेंगे
धधक रही भारत माँ की धरती पर
बादल बन क्या निर्मल जल बरसाएंगे
आजाद भारत की संकल्पना
तब हम सच्चे अर्थों में पाएंगे
जय हिंद जय हिंद का नारा कहने में
फिर हम न शर्मायेंगे

काटों भरे सफ़र में चलना सिखाया तुमने

काटों भरे सफ़र में चलना सिखाया तुमने
मेरे लड़खड़ाते क़दमों को हर पल सम्भाला तुमने
कुम्हलाये जीवन को फिर से खिलाया तुमने
बेरंग जिंदगी में फिर से रंग भरे तुमने
बुझते चरागों को फिर से जलाया तुमने
मेरे हर एक गम को अपना बनाया तुमने
मेरे हर जख्म पे मरहम लगाया तुमने
रोती जिंदगी में हसना सिखाया तुमने
मुश्किलों में भी लड़ना सिखाया तुमने
प्यार की हर रीती को है निभाया तुमने
प्यार की खातिर सब कुछ लुटाया तुमने
प्यार के बदले माँगा नहीं कुछ तुमने
क्या समझकर कर दिया मुझ पे जीवन निसार तुमने
प्यार को त्याग से सींचा है बस तुमने
.........................धर्मेन्द्र

Monday, August 29, 2011

कहती हो मै तो हूँ कुछ भी नहीं
मेरे जाने से ही तुम घबराओगी
होंगे बहुत चाहने वाले तेरे
मुझसा कहाँ कोई तुम पाओगी
अभी चाहे मचलो इतराओ तुम
हमारे बिना ना तुम रह पाओगी
जमाना चाहे लाख रोके तुम्हे
मोहब्बत में मेरी चली आओगी
जब हम न होंगे ऐ सनम
ख्वाबों में भी तुम पछताओगी
मर
जाऊंगा मै अगर तो कहीं
तुम भी ना फिर तो जी पाओगी

Sunday, August 14, 2011

तुम---एक अहसास

है राग मेरा ,
हो रागिनी तुम
हैं गीत मेरे
उनकी आवाज़ हो तुम
हैं शब्द मेरे
उनकी पहचान हो तुम
है ध्वनि मेरी
प्रतिध्वनी हो तुम
हैं भाव मेरे
उनकी संकल्पना हो तुम
हैं स्वप्न मेरे
उन स्वप्नों का नाम हो तुम
हैं अधर मेरे
उनकी मुस्कान हो तुम
हैं लक्ष्य मेरे
उनका मार्ग हो तुम
हैं विचार मेरे
उनकी प्रेरणा हो तुम
हूँ जीवित मै
हो जीने का अहसास तुम
है जीवन मेरा
हो इसकी साँस तुम
मेरे जीवन की धूप में
सुनहरी छाया हो तुम
मेरे ढलते जीवन की
एकमात्र आशा हो तुम
मेरे जीवन समर में
अकेली संगिनी हो तुम
मेरी हर उलझन का
एक सुलझा हल हो तुम
मेरी हर उपलब्धि से बढ़कर
सबसे बड़ी उपलब्धि हो तुम
मेरी हर ख़ुशी से बढकर
सबसे बड़ी ख़ुशी हो तुम
मेरे घर-मंदिर की
देवी हो तुम
मेरी पूजा मेरी आस्था
मेरा विस्वास हो तुम
मेरी साँस मेरी शक्ति
मेरे जीने का आधार हो तुम
और सबसे बढ़कर
मेरी आत्मा मेरा संसार हो तुम
.................कुमार धर्मेन्द्र

माँ

माँ करुणा है ममता है , माँ साक्षात् स्नेह की प्रतिमा है 
 माँ सहारा है किनारा है , माँ का आँचल अनमोल छाया है 
 माँ देवी है प्रार्थना है माँ शक्ति है भावना है
  माँ गीत है लोरी है माँ सखी है सहेली है
  माँ त्याग है तपस्या है माँ पूजा का थाल है 
 माँ जीवन की नाव है पतवार है माँ साक्षात् अवतार है
  माँ महान है वरदान है माँ का पुत्र खुद भगवान् है 
 माँ सपना है संसार है माँ के सिवा न दूसरा कोई जहान है
  फिर भी माँ अकेली है लाचार है असहाय है बीमार है
 ये कितना बड़ा सवाल है फिर भी माँ का ह्रदय विशाल है
 हर गम हर आंसू में भी तेरे लिए दुआ का नाम है
माँ माँ है माँ की ना उपमा है ना कोई उपमान है
माँ का इस जहान में सबसे बड़ा स्थान है
 इसलिए माँ को कभी मत दुखाना नहीं तो नरक निदान है ..........................dharmendra

हम भारतीय कुछ विशेष हैं....

राग हैं द्वेष हैं
हम भारतीय कुछ विशेष हैं
शक्ति नहीं है जिनमे
वो नेता हैं विशेष हैं
शरहद के के सिपाही हैं
फिर भी अवशेष हैं

ये b.tech जीवन है....

नए नए आये थे
एक दूजे से अनजाने थे
खुलकर मिलने में भी
हम सब थोडा सकुचाते थे

नाम पूछते बतलाते थे
फिर थोडा सा मुस्काते थे
निश्चल कोमल मन से
अपने भाव जगाते थे

सुबह सुबह उठकर मेस में
हाल चाल बतियाते थे
बस से कॉलेज तक
हम सब संग में जाते थे

हर assignment छाप छाप कर
अपना ज्ञान बढ़ाते थे
पहले जाने वाली बस में
लद लद कॉलेज से जाते थे

mass bunk करके हम सब
कुछ पढ़ाकुओं को समझाते थे
कॉलेज ना जाने पर हम सब
खूब proxy लगवाते थे

कुछ का नाम बिगाड़ा करते
कुछ की मौज उड़ाते थे
जन्म दिन के मौके पर
लातों से भूत बनाते थे

VP की class में हम सब
खर्राटे खूब लगाते थे
VT को देख देख
मन ही मन हर्षाते थे

मतभेद कभी जो बढ़ गये
खुद ही सुलझाते थे
एक दूजे से घुल मिल
माहौल को मस्त बनाते थे

सुट्टे पे सुट्टा हम सब
खूब उड़ाते थे
हर ख़ुशी के मौके पर
bear पे bear चढाते थे

exam समय आने पर
खुद को रात रात जगाते थे
समझ नहीं आने पर
"मुझे पढ़ा दे " का नारा खूब लगाते थे

जैसे तैसे exam पास कर
यूहीं समय बितातते थे
रात में खुद को नीद ना आने पर
जोर जोर से चिल्लाते थे

अब placement time आया है
tension को संग में लाया है
रात रात घिसते हैं
फिर भी कहीं नहीं हो पाया है

कुछ की लग गयी है
कुछ की लगने वाली है
नौकरी की चिंता क्यूँ करते हो
वो तो अपनी घरवाली है

आज नहीं तो कल
लग ही जाएगी
कुछ को google कुछ को tcs
यारों मिल ही जाएगी

ये मौज मस्ती के पल
फिर ना कभी आएंगे
चार बरस जीवन के ये
सबसे सुखमय कहलाएँगे

बीबी होगी बच्चे होंगे
उनको खूब बताएँगे
चार बरस जीवन के
यारों वापस कभी नहीं आयेंगे

बूढ़े भारत को कोई नयी जवानी दे दे

मेरे बुझते दीपक को कोई
चंद रोशनी दे दे
खून से सींचा है कोई
दो बूंद पसीने की दे दे

थोड़ी सी मुझको कोई
अपनी चंद जवानी दे दे
मेरे बूढ़े भारत को कोई
फिर से नयी रवानी दे दे

सूखे पड़े नर कंकालों में कोई
चंद रक्त की बुँदे दे दे
देश के युवकों में से कोई
मुझको चंद स्वाभिमानी दे दे

१०० करोड़ों में से कोई
आजादी के चंद दीवाने दे दे
फिर से मेरी भारत माँ कोई
साँस हवा औ पानी दे दे

तू इन छंदों की खातिर
माँ मेरी तू क़ुरबानी ले ले
पर मेरी माँ को इनमे से कोई
फिर से नयी निशानी दे दे

मेरे बूढ़े भारत को कोई
फिर से नयी जवानी दे दे

Friday, August 12, 2011

हे राष्ट्र तुम्हे प्रणाम

हे राष्ट्र तुम्हे प्रणाम

हे राष्ट्र तुम्हे प्रणाम

गाता हूँ तेरी अमरता का गुन गान

हे राष्ट्र तुम्हे प्रणाम

पर किन शब्दों से कह दूं

मै तुझको महान

हे राष्ट्र तुम्हे प्रणाम

हे राष्ट्र तुम्हे प्रणाम

भूखे सोते जहाँ इंसान

रबड़ी मलाई खाते श्वान

कैसे कह दूं तुझको महान

हे राष्ट्र तुम्हे प्रणाम

सौ-सौ जाति सौ-सौ धर्म

बटे पड़े हैं यहाँ भगवान्

रोज यहाँ दंगे होते

हर क्षण बनते मरघट शमशान

कैसे कह दूं तुझको महान

हे राष्ट्र तुम्हे प्रणाम

हर बम धमाके में जहां

मरती आम जनता आम इंसान

झूठी सांत्वना आश्वासन देकर

बनते नेता यहां महान

कैसे कह दूं तुझको महान

हे राष्ट्र तुम्हे प्रणाम

भगत आजाद बिस्मिल महान

फीके पड़े हैं उनके बलिदान

घट घट पे जो घोटाले करते

होता यहाँ उनका सम्मान

कैसे कह दूं तुझको महान

हे राष्ट्र तुम्हे प्रणाम

चंद पढ़े लिखों को छोड़ो

बाकी जनता अनपढ़ अनजान

न बिजली पानी उसपे क़र्ज़ महान

आत्महत्या कर रहे किसान

कैसे कह दूं तुझको महान

हे राष्ट्र तुम्हे प्रणाम

लोकतंत्र की रक्षा की खातिर

कानून बनाया बड़ा महान

मुजरिम बहार घुमा करते

बस पिसते हैं बेबस इंसान

कैसे कह दूं तुम्हे महान

हे राष्ट्र तुम्हे प्रणाम

कहते हैं भारत महान

खुद जन्मे थे यहाँ भगवान्

चंद पैसों की खातिर अब

बदले जाते हैं भगवान्

कैसे कह दूं तुझको महान

हे राष्ट्र.......

धर्मेन्द्र


मैंने रातों का भारत देखा

बन के आवारा मै

रातों को भारत देखा

गली कुचों पे सड़कों पे

मैंने शमशान सा सन्नाटा देखा

A .C . के बड़े घरों में

लोगों को सोते देखा

सड़क किनारे सोतों को

कारों से कुचले देखा

सूखे हड्डी के पिंजड़ों को

मैंने जीवन खोते देखा

रोटी के एक कतरे की खातिर

कुत्तों औ इंसानों को लड़ते देखा

वहीँ सामने गलियारे में

सुन्दर मयखाना देखा

लाखों का वारा न्यारा होता

ये घंटे भर में देखा

मयखाने में जाती नगर वधू पे

मैंने लाखों लूटते देखा

वहीँ किनारे पड़े आकुलाते

भूखों को मैंने दुरियाते देखा

कुछ मासूमों को मैंने

राहों में भटकते देखा

कुछ को रोते देखा

कुछ को बिकते देखा

सड़कों पे शहजादों को

मैंने खूब पीते देखा

वहीँ बड़ी कारों में अबला की

अस्मत को लुटते देखा

कुछ सरकार के रखवालों को

मैंने मुंह घुमाते देखा

कुछ को पैसे लेते देखा

कुछ को पीठ थपथपाते देखा

वहीँ सामने चौराहे पे

मैंने गाँधी का पुतला देखा

मजबूरी का नाम महात्मा गाँधी

ये उसको कहते देखा

रातों को अंधियारे में

मैंने हर मंजर देखा

कहीं जश्न तो कहीं

मातम का माहौल को देखा

सच कहूं तो मैंने

रातों का भारत देखा

और इस भारत को मैंने

यूँही आगे बढते देखा

मैंने रातों का भारत देखा...

गर्व करूँ किस भारत पर

जब मैंने अतीत के भारत को

इस भारत का चमचा देखा

संस्कारों को मिटते देखा

अच्छाई का दम घुटते देखा

हाँ उस गौरवशाली भारत को

रातों में मरते देखा

हाँ मैंने रातों का भारत देखा

हाँ मैंने रातों का भारत देखा

...............................धर्मेन्द्र