Wednesday, April 15, 2026

Vo mehboob tha ya katil

 वो महबूब था या क़ातिल

उसका दिल था या ख़ंजर, ये फ़ैसला न हो सका,
मेरी मासूम मोहब्बत का यूँ क़त्ल हो गया।

उसे महबूब कहूँ या क़ातिल की संज्ञा दूँ,
वो मेरी मौत पे नहीं, ज़िंदा देख खुश हो गया।

लूटा है हर किसी ने इस दिल को मौक़ा पाकर,
जिस जिस को भी हाथ लगा, वो सौदा कर गया।

मैं मर के भी सुकून से जीने की ठान बैठा,
वो जीते जी मेरी हर साँस पे हँसता रह गया।

वफ़ा की राह में हम खुद को मिटाते ही रहे,
और वो हर मोड़ पे बेवफ़ाई का जश्न कर गया।

अब शिकवा भी क्या करें उस बेरहम ज़माने से,
जिसे अपना समझा, वही हमें ख़त्म कर गया।

Monday, April 13, 2026

Koi yaad picha karti h parchayi ki tarah

 कोई याद पीछा करती है परछाईं की तरह,

मैं ख़ुद से भागता फिरूँ तन्हाई की तरह।


हर एक ख़्वाब जल गया, धुआँ भी थम न सका,

वो दिल में पल रही है अंगड़ाई की तरह।


मिटा के हर निशाँ उसे भुलाने की ठानी थी,

वो लौट-लौट के आई सच्चाई की तरह।


ये इश्क़ था या कोई बग़ावत थी रूह में,

जो फूटता है सीने में अंगाराई की तरह।


मैं अपने ज़ख्म सी के भी मुस्कुरा रहा हूँ अब,

ये ज़िंदगी भी लगती है रुसवाई की तरह।


‘राख’ अब ख़ुद अपनी ही कब्र पे खड़ा है यूँ,

कोई तमाशा देखे तमाशाई की तरह।

Kya mai insaan man h version

 


Mai inssan hu


Ya  Vaham palta hu insaniyat ka 


Khudgarji me janwar ban jata hu


 Fir bhi Mai kya insaan hu 


Bs baat hi karta hu aman chain ki


 Ropta asal me yudh ke beej hu 


Kya mai insan hu 


Apno ka hi sir kata h


 Apno ko hi jala ke mara hu


 Sajis bhi apno ke khilaf karta hu


 Fir bhi mai jhuthi hansi rakhta hu 


Har roz jalan ki aag me jalta hu 


  Apna zamir bechkar khud ko zinda rakhta hu Aise aise kaam jo janwar bhi na kare


 Unko karne se kahan darta hu


  Mai insaan hu 


kya wakai me insaan hu


Ret ke mahal aur 


Samsan ke andhere h 


Zinda ki shakl me murde tahal rahe hain 


Bheed me kayar bankar hatya kar balwan ban rahe h


Kya hum insan hai 


Ya iske hone ka vahan pal rahe h


Bs luta nocha aur hawas ki aag bhadka rahe h


Dikkawe kon zindagi aur 


Zindagi me dikhawa bana rahe 


Astin ke sapon ke bharose bharosa de rahe 


Har cheez me insaan hone ka haq gira rahe h


Kya mai insaan hu 


Isan hokar bhi maroge kutte ki maut chaurahe pe 


Fir bhi dhong dhokhe aur chaalbaazi ki misal hu 


Kya mai insaan hu 




Insaniyat jabtak dil me zinda h


Tak Tak insaan hu 


Warna Foonk diya jaunga ek din 


Fir bhi hawas ki aag me jalti ek laas hu


Urdu ke sath teekhi  gazal ke form me banao 


ग़ज़ल: “क्या मैं इंसान हूँ?” (Raakh)


वहम-ए-इंसानियत का चोग़ा ओढ़े मैं चल रहा हूँ

अपने ही साये के पीछे खुद से ही जल रहा हूँ


मैं अमन की ज़बान बोलकर बीज-ए-जंग बोता रहा

दिल के बाज़ार में हर रोज़ खुद को ही छल रहा हूँ


खून रिश्तों का भी मैंने ही अपने हाथों से किया

फिर भी आईने में हर बार “इंसान” बन निकल रहा हूँ


साज़िशों की राख में अपनी ही पहचान जला दी

मैं ही कातिल, मैं ही मसीहा—ये कैसा फल रहा हूँ


भीड़ में शामिल हूँ लेकिन भीड़ से भी गुमशुदा हूँ

ज़िंदा लाशों के शहर में मैं भी एक हलचल रहा हूँ


हवस की आग में जलकर भी बुझती नहीं ये रूह

रोज़ खुद की ही अदालत में मैं ही दलील-ए-कल रहा हूँ


अस्तीन के साँप भी अब अपना ही ख़ून पी रहे हैं

मैं भरोसे के जनाज़े पर बैठा इक पल रहा हूँ


क्या मैं इंसान हूँ? ये सवाल हर साँस में है

इंसानियत अगर दिल में है तो मैं अभी तक चल रहा हूँ


वरना जिस दिन बुझ गया ये अंदर का चराग़-ए-रूह

फिर मैं भी बस “राख” बनकर रास्तों में मिल रहा हूँ



Manch wali gazal ke form


मंच-ग़ज़ल: “क्या मैं इंसान हूँ?” (स्टेज वर्ज़न / ताली-तूफ़ान अंदाज़)


(धीमे सुर में शुरुआत… फिर तेज़ होता हुआ)


वहम-ए-इंसानियत का नक़ाब पहन के घूम रहा हूँ…

अपने ही ज़मीर की क़ब्र पे चैन से झूम रहा हूँ…


भीड़ में खड़ा हूँ, मगर भीड़ से भी अंजान हूँ…

हर साँस में सवाल है—क्या मैं इंसान हूँ?


(रुककर, दर्शकों की तरफ़ नज़र…)

बोलो! क्या मैं इंसान हूँ?


मैं अमन की बात करता हूँ… जंग के बीज बोता हूँ…

अपने ही घर की दीवारों में, आग रोज़ ढोता हूँ…


रिश्तों के खून से मैंने, अपनी तक़दीर लिखी…

और फिर आईने के आगे खड़ा—खुद को महान हूँ!

क्या मैं इंसान हूँ?


(तेज़ बीट की तरह शेर)

साज़िश मेरी रगों में है, और मुस्कान होठों पे…

क़ातिल भी मैं, मसीहा भी मैं—दोनों पहचान हूँ…


ज़मीर बेच के जो जिंदा है, वो जिंदा है या मरा?

मैं खुद ही अपने सवालों का सरेआम बयान हूँ…

क्या मैं इंसान हूँ?


(भीड़ से कॉल-एंड-रिस्पॉन्स)

बोलो ज़रा ज़ोर से! क्या मैं इंसान हूँ?


अस्तीन के साँपों से अब दोस्ती भी कर ली मैंने…

और अपने ही उजाले को अंधेरों में भर ली मैंने…


हवस की आग में जलकर भी बुझता नहीं ये सफ़र…

मैं राख भी हूँ, मैं शोला भी हूँ—अजीब दास्तान हूँ…


क्या मैं इंसान हूँ?


(अंतिम धीमा, फिर धमाका)

अगर दिल में इंसानियत है… तो शायद इंसान हूँ…

वरना जिस दिन ये बुझ गई… बस एक चलती लाश हूँ…


(रुककर फुसफुसाहट)

और आख़िरी बार पूछता हूँ…


क्या मैं इंसान हूँ?

Kya mai insaan hu original version 2

 



Mai inssan hu

Ya  Vaham palta hu insaniyat ka 

Khudgarji me janwar ban jata hu

 Fir bhi Mai kya insaan hu 

Bs baat hi karta hu aman chain ki

 Ropta asal me yudh ke beej hu 

Kya mai insan hu 

Apno ka hi sir kata h

 Apno ko hi jala ke mara hu

 Sajis bhi apno ke khilaf karta hu

 Fir bhi mai jhuthi hansi rakhta hu 

Har roz jalan ki aag me jalta hu 

  Apna zamir bechkar khud ko zinda rakhta hu Aise aise kaam jo janwar bhi na kare

 Unko karne se kahan darta hu

  Mai insaan hu 

kya wakai me insaan hu

Ret ke mahal aur 

Samsan ke andhere h 

Zinda ki shakl me murde tahal rahe hain 

Bheed me kayar bankar hatya kar balwan ban rahe h

Kya hum insan hai 

Ya iske hone ka vahan pal rahe h

Bs luta nocha aur hawas ki aag bhadka rahe h

Dikkawe kon zindagi aur 

Zindagi me dikhawa bana rahe 

Astin ke sapon ke bharose bharosa de rahe 

Har cheez me insaan hone ka haq gira rahe h

Kya mai insaan hu 

Isan hokar bhi maroge kutte ki maut chaurahe pe 

Fir bhi dhong dhokhe aur chaalbaazi ki misal hu 

Kya mai insaan hu 


Insaniyat jabtak dil me zinda h

Tak Tak insaan hu 

Warna Foonk diya jaunga ek din 

Fir bhi hawas ki aag me jalti ek laas hu 

Kya mai insaan hu

 


Mai inssan hu 

Vahan palta hu insaniyat ka 

Khudgarji me janwar ban jata hu 

Mai insaan hu 

Bs baat hi karta hu aman chain ki 

Ropta asal me yudh ke beej hu 

Kya mai insan hu 


Apno ka hi sir kata h 

Apno ko hi jala ke mara hu 

Sajis bhi apno ke khilaf karta hu 

Fir bhi mai jhukar namaskar karta hu


Har roz jeene ki aas khud ko Marta hu 

Apna zamir bechkar khud ko zinda rakhta hu 

Aise aise kaam jo janwar bhi na kare 

Unko karne se sukun pata hu 


Mai insaan hu kya wakai me insaan hu 


बहुत गहरी और चुभती हुई कविता है… इसमें सवाल भी है, अपराधबोध भी और सच्चाई का आईना भी।

मैं इसे थोड़ा और धारदार, मंचीय (stage) और “विद्रोही” अंदाज़ में तराश देता हूँ — ताकि सुनने वालों के अंदर तक लगे:


"क्या मैं इंसान हूँ?" ( सभी इंसानों के लिए )

मैं इंसान हूँ…?

या बस नाम का एक इल्ज़ाम हूँ…?

इंसानियत की गोद में पला,

मगर ख़ुदगर्ज़ी में हर रोज़ ढला,

आईने में खुद को देखता हूँ तो

एक जानवर से भी बदतर खड़ा मिलता हूँ…

मैं इंसान हूँ…?

बातें तो करता हूँ अमन-चैन की,

लबों पे शांति, हाथों में जंग की तैयारी,

बीज बोता हूँ नफ़रत के हर रोज़,

और कहता हूँ — “ये तो बस मजबूरी है हमारी…”

क्या मैं इंसान हूँ…?

अपनो की ही लाशों पे महल बनवाए हैं,

अपनों के ही  खून से अपने हाथ रंगवाए  हैं,

साज़िशें भी अपनों के खिलाफ रची,

फिर मंदिर-मस्जिद में सर झुकाए हैं…

वाह रे इंसान…!

हर रोज़ जीने की आस में मरता हूँ,

ज़मीर बेचकर साँसें भरता हूँ,

ऐसे-ऐसे काम किए हैं मैंने

जो दरिंदे भी करने से डरते हैं…

और फिर कहता हूँ —

मैं इंसान हूं,और ऐसे ही 

“मुझे सुकून मिलता है…”

सुकून…? या सज़ा है ये…?

मैं इंसान हूँ…

या अपने ही अस्तित्व का गुनहगार हूँ…?

अगर यही इंसानियत है,

तो मैं इस इंसान होने  से इंकार करता हूँ…!

“राख” पूछता  है हर जलते हुए ज़मीर से —

तू इंसान है… या लालच हवस खुदगर्जी से भरा 

बस चलता-फिरता कब्रिस्तान है…?


 


Thoda urdu touch n gazal ke form me


शीर्षक: क्या मैं इंसान हूँ? (ग़ज़ल-ए-अल्फ़ाज़)


वहम-ए-इंसानियत को दिल में बसाए फिरता हूँ,

ख़ुदगर्ज़ियों में मगर, रोज़ मरता-सा फिरता हूँ।

अमन की बात करता हूँ महफ़िलों के शोर में,

और अंदर ही अंदर जंग के बीज बोता फिरता हूँ।


क्या मैं इंसान हूँ?


अपनों के ख़ून से ही अपने ही हाथ रंगे हैं,

और फिर भी आइनों में सच को ढूँढ़ता फिरता हूँ।

मुस्कुराहट ओढ़कर मैं ज़हर सा घोलता रहा,

ज़मीर बेच के भी खुद को पाक समझता फिरता हूँ।


क्या मैं इंसान हूँ?

शमशान-सा सन्नाटा है रिश्तों की इस भीड़ में,

लाशों के इस शहर में मैं भी जिंदा सा फिरता हूँ।

कायर हूँ, मगर चेहरे पे रौब-ए-इंसानियत,

हर सच को झूठ की चादर में लपेटता फिरता हूँ।


क्या मैं इंसान हूँ?

आस्तीन के साँपों पे एतबार करता रहा,

हर ज़हर को मोहब्बत का नाम देता फिरता हूँ।

हवस की आग में जलकर भी बुझता नहीं ये दिल,

राख होके भी मैं “राख” सा ही उड़ता फिरता हूँ।


राख” पूछता है हर जलते हुए ज़मीर से —

तू इंसान है… या बस चलता-फिरता कब्रिस्तान है…?


****""""""""""""""""""*"

क्या मैं इंसान हूँ? थोड़ा उर्दू के साथ 


अगर दिल में कहीं अब भी बची है रौशनी,

तो शायद मैं इंसान हूँ, ये वहम रखता फिरता हूँ…

वरना इस भीड़-ए-ज़िंदगी में बस एक साया हूँ,

जो अपने ही वजूद से रोज़ लड़ता फिरता हूँ।

Kya hindu kya musal mann


क्या हिन्दू क्या मुस्लमान
जानें  सभी ने दी हैं वतन के वास्ते
मैं  इस बहस  में ही क्यों पडूँ
जो मेरा वतन तोड़ दे

भगत सिंह , बिस्मिल ,आज़ाद , अश्फाक उल्ला खान
चढ़े  हैं सूली  वतन के वास्ते
अटल -कलाम-गांधी - ने जडे कई मुकुट
इस वतन वास्ते

बस इतनी  दुआ है
न कोई हो यतीम धर्म के वास्ते
न कोई जले घर धर्म के वास्ते
झुके सिर   मंदिरों में
उठे दुआ के हाथ  मस्जिदों में
हर एक इंसान हो दिल से हिंदुस्तानी
इस वतन के वास्ते
मैं  इस बहस  में ही क्यों पडूँ
जो मेरा वतन तोड़ दे


भगत सिंह की चिंगारी हूँ, बिस्मिल का इंक़लाब लिखता हूँ,
आज़ाद की आज़ादी हूँ, अश्फ़ाक का ख़्वाब लिखता हूँ!

ना कोई बच्चा हो यतीम यहाँ मज़हब की तलवार से,
ना जले कोई आशियाँ फिर नफ़रत के बाज़ार से।


शीर्षक: वतन के वास्ते

क्या हिन्दू, क्या मुसलमान—सबने जानें दी हैं वतन के वास्ते,
मैं इस बहस में ही क्यों पड़ूँ, जो बाँट दे दिल वतन के वास्ते।

खून से सींचा गया है ये चमन, हर रंग, हर एक जात का,
किस मुँह से तुम नफ़रत बोओगे इस पावन मिट्टी के वास्ते।

भगत सिंह, बिस्मिल, आज़ाद, अशफ़ाक़—हँसते-हँसते सूली चढ़ गए,
कौन था हिन्दू, कौन मुसलमान—किसे फुर्सत थी वतन के वास्ते।

अटल की वाणी, कलाम का सपना, गांधी का वो सत्य अहिंसा,
कितने दीप जलाए गए हैं अंधियारों से लड़ने के वास्ते।

न कोई बच्चा यतीम बने धर्म की इस अंधी जंग में,
न कोई घर जले फिर से मज़हब की झूठी आग के वास्ते।

मंदिरों में सिर झुकें अगर, तो मस्जिद में भी उठें दुआ के हाथ,
इंसानियत का हो एक मज़हब, इस हिंदुस्तान के वास्ते।

तू खुद से पूछ, ऐ इंसान—क्यों ज़हर उगलता है अपनों पर,
क्या तेरी रगों में बहता लहू नहीं है इस वतन के वास्ते?

मैं इस बहस में ही क्यों पड़ूँ, जो मेरा वतन तोड़ दे,
मेरा हर लफ़्ज़, हर साँस कुर्बान है इस वतन के वास्ते।


 with urdu gazal form 



क्या हिन्दू, क्या मुसलमाँ—ये जंग तुम्हारी साज़िश है,
वतन की मिट्टी रोती है, ये कैसी ख़ून की बारिश है।

मैं क्यों पड़ूँ उस बहस में जो नफ़रत को जन्म दे,
जो दिल को बाँटे, रूह को तोड़े—वो कैसी दानिश है?

भगत, बिस्मिल, आज़ाद, अशफ़ाक़—सबने हँसकर जान दी,
तुम बताओ, किस मज़हब की थी वो पाक सी ख़्वाहिश है?

तुमने मज़हब को ढाल बना कर तख़्त सजाए हैं,
ये इश्क़-ए-वतन नहीं साहब—ये सियासत की नुमाइश है।

अटल की ज़ुबां, कलाम का ख़्वाब, गांधी का सच कुचल दिया,
अब हर गली में नफ़रत बिकती—ये कैसी नई पैदाइश है?

कभी मंदिर जलते देखे, कभी मस्जिद पे वार हुआ,
ये किसका ख़ुदा खुश होगा—ये कैसी बंदिश है?

मासूमों के जिस्म जलाए, और नाम दिया तुमने “धर्म” उसे,
ये इबादत नहीं दरिंदगी है, ये रूह की साज़िश है।

ना कोई बच्चा यतीम बने, ना कोई माँ का आँचल जले,
वरना ये मुल्क नहीं रहेगा—सिर्फ़ लाशों की नुमाइश है।

तू खुद से पूछ ऐ इंसां—क्या तू ज़िंदा भी है या नहीं?
जो नफ़रत में डूबा हो पूरा—वो बस चलता फिरता ख़ारिश है।

मैं चुप नहीं अब बैठूँगा, मैं सच को खुलकर बोलूँगा,
जो वतन को बाँटने निकले—उनके खिलाफ़ ये बग़ावत की बारिश है।

Xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxx



शीर्षक: वतन के वास्ते

क्या हिन्दू, क्या मुसलमान—सबने जानें दी हैं वतन के वास्ते,
मैं इस बहस में ही क्यों पड़ूँ, जो बाँट दे दिल वतन के वास्ते।

खून से सींचा गया है ये चमन, हर रंग, हर एक जात का,
किस मुँह से तुम नफ़रत बोओगे इस पावन मिट्टी के वास्ते।

भगत सिंह, बिस्मिल, आज़ाद, अशफ़ाक़—हँसते-हँसते सूली चढ़ गए,
कौन था हिन्दू, कौन मुसलमान—किसे फुर्सत थी वतन के वास्ते।

अटल की वाणी, कलाम का सपना, गांधी का वो सत्य अहिंसा,
कितने दीप जलाए गए हैं अंधियारों से लड़ने के वास्ते।

न कोई बच्चा यतीम बने धर्म की इस अंधी जंग में,
न कोई घर जले फिर से मज़हब की झूठी आग के वास्ते।

मंदिरों में सिर झुकें अगर, तो मस्जिद में भी उठें दुआ के हाथ,
इंसानियत का हो एक मज़हब, इस हिंदुस्तान के वास्ते।

तू खुद से पूछ, ऐ इंसान—क्यों ज़हर उगलता है अपनों पर,
क्या तेरी रगों में बहता लहू नहीं है इस वतन के वास्ते?

मैं इस बहस में ही क्यों पड़ूँ, जो मेरा वतन तोड़ दे,
मेरा हर लफ़्ज़, हर साँस कुर्बान है इस वतन के वास्ते।


Hardcore attack with urdu gazal 

शीर्षक: “मज़हब के सौदागर”

क्या हिन्दू, क्या मुसलमाँ—ये जंग तुम्हारी साज़िश है,
वतन की मिट्टी रोती है, ये कैसी ख़ून की बारिश है।

मैं क्यों पड़ूँ उस बहस में जो नफ़रत को जन्म दे,
जो दिल को बाँटे, रूह को तोड़े—वो कैसी दानिश है?

भगत, बिस्मिल, आज़ाद, अशफ़ाक़—सबने हँसकर जान दी,
तुम बताओ, किस मज़हब की थी वो पाक सी ख़्वाहिश है?

तुमने मज़हब को ढाल बना कर तख़्त सजाए हैं,
ये इश्क़-ए-वतन नहीं साहब—ये सियासत की नुमाइश है।

अटल की ज़ुबां, कलाम का ख़्वाब, गांधी का सच कुचल दिया,
अब हर गली में नफ़रत बिकती—ये कैसी नई पैदाइश है?

कभी मंदिर जलते देखे, कभी मस्जिद पे वार हुआ,
ये किसका ख़ुदा खुश होगा—ये कैसी बंदिश है?

मासूमों के जिस्म जलाए, और नाम दिया तुमने “धर्म” उसे,
ये इबादत नहीं दरिंदगी है, ये रूह की साज़िश है।

ना कोई बच्चा यतीम बने, ना कोई माँ का आँचल जले,
वरना ये मुल्क नहीं रहेगा—सिर्फ़ लाशों की नुमाइश है।

तू खुद से पूछ ऐ इंसां—क्या तू ज़िंदा भी है या नहीं?
जो नफ़रत में डूबा हो पूरा—वो बस चलता फिरता ख़ारिश है।

मैं चुप नहीं अब बैठूँगा, मैं सच को खुलकर बोलूँगा,
जो वतन को बाँटने निकले—उनके खिलाफ़ ये बग़ावत की बारिश ह 


🎤 शीर्षक: “मैं चुप नहीं रहूँगा”

क्या हिन्दू!… क्या मुसलमाँ!…
(ठहराव)
ये जंग नहीं—साज़िश है!
वतन की मिट्टी पूछ रही—
किसकी ये ख़ूनी बारिश है!

मैं क्यों पड़ूँ उस बहस में…
जो भाई को भाई से लड़वा दे!
जो दिल में ज़हर भर दे…
और मुल्क को टुकड़ों में बंटवा दे!!

भगत सिंह… बिस्मिल… आज़ाद… अशफ़ाक़!
(आवाज़ ऊँची)
हँसते-हँसते सूली चढ़ गए!!
तुम बताओ—किस मज़हब के थे वो?!
(तेज़)
या सिर्फ़ हिंदुस्तान के लिए मर गए?!

ये जो मज़हब के ठेकेदार हैं…
(तंज)
इनका ईमान किराए पर है!
कुर्सी के लिए बेच दें वतन—
इनका ख़ुदा भी सौदे पर है!!

अटल की आवाज़ दबा दी…
कलाम के ख़्वाब जला दिए…
गांधी का सच कुचल कर तुमने…
नफ़रत के महल बना दिए!!

कभी मंदिर जला… कभी मस्जिद टूटी…
(गुस्से में)
और तुम ताली बजाते रहे!
इंसानियत मरती रही सड़कों पे—
और तुम धर्म बचाते रहे!!

मासूमों के जिस्म जलाकर…
नाम दिया तुमने “धर्म” उसे?!
(कड़क)
शर्म नहीं आई ज़रा भी?!
या बेच दिया तुमने कर्म उसे?!

ना कोई बच्चा यतीम बने…
ना माँ का आँचल जले कभी…
वरना याद रखना—
ये देश नहीं बचेगा… बस राख बचेगी सभी!!

(धीरे से, फिर तेज़)
तू खुद से पूछ ऐ इंसान…
ज़िंदा है… या सिर्फ़ साँसें ले रहा है?
अगर नफ़रत ही तेरी पहचान है—
तो तू इंसान नहीं… बस एक लाश जी रहा है!!

(आखिरी दहाड़ 🔥)
मैं चुप नहीं रहूँगा!!
सच को खुले आम कहूँगा!!
जो वतन को बाँटने निकले—
(तेज़, जोर से)
मैं उनके खिलाफ़ आग बनकर दहकूँगा!!!

Sunday, April 12, 2026

 कुछ अधूरे, कुछ मुकम्मल ख़्वाबों की शाम में बैठा हूँ,

मैं साहिल पे दरिया की ख़ामोश दास्तान में बैठा हूँ।


हर लहर लाती है जैसे कोई बीता हुआ-सा पैग़ाम,

मैं अपने ही जज़्बातों के अंजाम में बैठा हूँ।


कितनी राहें नाप डालीं मैंने तन्हा सफ़र में,

अब तेरे ही ख़्यालों के एक मुकाम में बैठा हूँ।


दिन भर की जंग के बाद ये दिल भी थक-सा गया है,

मैं अपने ही सुकून के इंतज़ाम में बैठा हूँ।


रफ़्ता-रफ़्ता पूरे होंगे ये जो ख़्वाब सजाए हैं,

इसी मीठे से वहम और एतमाद में बैठा हूँ।