Monday, April 13, 2026

Koi yaad picha karti h parchayi ki tarah

 कोई याद पीछा करती है परछाईं की तरह,

मैं ख़ुद से भागता फिरूँ तन्हाई की तरह।


हर एक ख़्वाब जल गया, धुआँ भी थम न सका,

वो दिल में पल रही है अंगड़ाई की तरह।


मिटा के हर निशाँ उसे भुलाने की ठानी थी,

वो लौट-लौट के आई सच्चाई की तरह।


ये इश्क़ था या कोई बग़ावत थी रूह में,

जो फूटता है सीने में अंगाराई की तरह।


मैं अपने ज़ख्म सी के भी मुस्कुरा रहा हूँ अब,

ये ज़िंदगी भी लगती है रुसवाई की तरह।


‘राख’ अब ख़ुद अपनी ही कब्र पे खड़ा है यूँ,

कोई तमाशा देखे तमाशाई की तरह।

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