Monday, April 13, 2026

Kya mai insaan hu

 


Mai inssan hu 

Vahan palta hu insaniyat ka 

Khudgarji me janwar ban jata hu 

Mai insaan hu 

Bs baat hi karta hu aman chain ki 

Ropta asal me yudh ke beej hu 

Kya mai insan hu 


Apno ka hi sir kata h 

Apno ko hi jala ke mara hu 

Sajis bhi apno ke khilaf karta hu 

Fir bhi mai jhukar namaskar karta hu


Har roz jeene ki aas khud ko Marta hu 

Apna zamir bechkar khud ko zinda rakhta hu 

Aise aise kaam jo janwar bhi na kare 

Unko karne se sukun pata hu 


Mai insaan hu kya wakai me insaan hu 


बहुत गहरी और चुभती हुई कविता है… इसमें सवाल भी है, अपराधबोध भी और सच्चाई का आईना भी।

मैं इसे थोड़ा और धारदार, मंचीय (stage) और “विद्रोही” अंदाज़ में तराश देता हूँ — ताकि सुनने वालों के अंदर तक लगे:


"क्या मैं इंसान हूँ?" ( सभी इंसानों के लिए )

मैं इंसान हूँ…?

या बस नाम का एक इल्ज़ाम हूँ…?

इंसानियत की गोद में पला,

मगर ख़ुदगर्ज़ी में हर रोज़ ढला,

आईने में खुद को देखता हूँ तो

एक जानवर से भी बदतर खड़ा मिलता हूँ…

मैं इंसान हूँ…?

बातें तो करता हूँ अमन-चैन की,

लबों पे शांति, हाथों में जंग की तैयारी,

बीज बोता हूँ नफ़रत के हर रोज़,

और कहता हूँ — “ये तो बस मजबूरी है हमारी…”

क्या मैं इंसान हूँ…?

अपनो की ही लाशों पे महल बनवाए हैं,

अपनों के ही  खून से अपने हाथ रंगवाए  हैं,

साज़िशें भी अपनों के खिलाफ रची,

फिर मंदिर-मस्जिद में सर झुकाए हैं…

वाह रे इंसान…!

हर रोज़ जीने की आस में मरता हूँ,

ज़मीर बेचकर साँसें भरता हूँ,

ऐसे-ऐसे काम किए हैं मैंने

जो दरिंदे भी करने से डरते हैं…

और फिर कहता हूँ —

मैं इंसान हूं,और ऐसे ही 

“मुझे सुकून मिलता है…”

सुकून…? या सज़ा है ये…?

मैं इंसान हूँ…

या अपने ही अस्तित्व का गुनहगार हूँ…?

अगर यही इंसानियत है,

तो मैं इस इंसान होने  से इंकार करता हूँ…!

“राख” पूछता  है हर जलते हुए ज़मीर से —

तू इंसान है… या लालच हवस खुदगर्जी से भरा 

बस चलता-फिरता कब्रिस्तान है…?


 


Thoda urdu touch n gazal ke form me


शीर्षक: क्या मैं इंसान हूँ? (ग़ज़ल-ए-अल्फ़ाज़)


वहम-ए-इंसानियत को दिल में बसाए फिरता हूँ,

ख़ुदगर्ज़ियों में मगर, रोज़ मरता-सा फिरता हूँ।

अमन की बात करता हूँ महफ़िलों के शोर में,

और अंदर ही अंदर जंग के बीज बोता फिरता हूँ।


क्या मैं इंसान हूँ?


अपनों के ख़ून से ही अपने ही हाथ रंगे हैं,

और फिर भी आइनों में सच को ढूँढ़ता फिरता हूँ।

मुस्कुराहट ओढ़कर मैं ज़हर सा घोलता रहा,

ज़मीर बेच के भी खुद को पाक समझता फिरता हूँ।


क्या मैं इंसान हूँ?

शमशान-सा सन्नाटा है रिश्तों की इस भीड़ में,

लाशों के इस शहर में मैं भी जिंदा सा फिरता हूँ।

कायर हूँ, मगर चेहरे पे रौब-ए-इंसानियत,

हर सच को झूठ की चादर में लपेटता फिरता हूँ।


क्या मैं इंसान हूँ?

आस्तीन के साँपों पे एतबार करता रहा,

हर ज़हर को मोहब्बत का नाम देता फिरता हूँ।

हवस की आग में जलकर भी बुझता नहीं ये दिल,

राख होके भी मैं “राख” सा ही उड़ता फिरता हूँ।


राख” पूछता है हर जलते हुए ज़मीर से —

तू इंसान है… या बस चलता-फिरता कब्रिस्तान है…?


****""""""""""""""""""*"

क्या मैं इंसान हूँ? थोड़ा उर्दू के साथ 


अगर दिल में कहीं अब भी बची है रौशनी,

तो शायद मैं इंसान हूँ, ये वहम रखता फिरता हूँ…

वरना इस भीड़-ए-ज़िंदगी में बस एक साया हूँ,

जो अपने ही वजूद से रोज़ लड़ता फिरता हूँ।

No comments:

Post a Comment