वो महबूब था या क़ातिल
उसका दिल था या ख़ंजर, ये फ़ैसला न हो सका,
मेरी मासूम मोहब्बत का यूँ क़त्ल हो गया।
उसे महबूब कहूँ या क़ातिल की संज्ञा दूँ,
वो मेरी मौत पे नहीं, ज़िंदा देख खुश हो गया।
लूटा है हर किसी ने इस दिल को मौक़ा पाकर,
जिस जिस को भी हाथ लगा, वो सौदा कर गया।
मैं मर के भी सुकून से जीने की ठान बैठा,
वो जीते जी मेरी हर साँस पे हँसता रह गया।
वफ़ा की राह में हम खुद को मिटाते ही रहे,
और वो हर मोड़ पे बेवफ़ाई का जश्न कर गया।
अब शिकवा भी क्या करें उस बेरहम ज़माने से,
जिसे अपना समझा, वही हमें ख़त्म कर गया।
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