कुछ अधूरे, कुछ मुकम्मल ख़्वाबों की शाम में बैठा हूँ,
मैं साहिल पे दरिया की ख़ामोश दास्तान में बैठा हूँ।
हर लहर लाती है जैसे कोई बीता हुआ-सा पैग़ाम,
मैं अपने ही जज़्बातों के अंजाम में बैठा हूँ।
कितनी राहें नाप डालीं मैंने तन्हा सफ़र में,
अब तेरे ही ख़्यालों के एक मुकाम में बैठा हूँ।
दिन भर की जंग के बाद ये दिल भी थक-सा गया है,
मैं अपने ही सुकून के इंतज़ाम में बैठा हूँ।
रफ़्ता-रफ़्ता पूरे होंगे ये जो ख़्वाब सजाए हैं,
इसी मीठे से वहम और एतमाद में बैठा हूँ।
No comments:
Post a Comment