Monday, April 13, 2026

Kya hindu kya musal mann


क्या हिन्दू क्या मुस्लमान
जानें  सभी ने दी हैं वतन के वास्ते
मैं  इस बहस  में ही क्यों पडूँ
जो मेरा वतन तोड़ दे

भगत सिंह , बिस्मिल ,आज़ाद , अश्फाक उल्ला खान
चढ़े  हैं सूली  वतन के वास्ते
अटल -कलाम-गांधी - ने जडे कई मुकुट
इस वतन वास्ते

बस इतनी  दुआ है
न कोई हो यतीम धर्म के वास्ते
न कोई जले घर धर्म के वास्ते
झुके सिर   मंदिरों में
उठे दुआ के हाथ  मस्जिदों में
हर एक इंसान हो दिल से हिंदुस्तानी
इस वतन के वास्ते
मैं  इस बहस  में ही क्यों पडूँ
जो मेरा वतन तोड़ दे


भगत सिंह की चिंगारी हूँ, बिस्मिल का इंक़लाब लिखता हूँ,
आज़ाद की आज़ादी हूँ, अश्फ़ाक का ख़्वाब लिखता हूँ!

ना कोई बच्चा हो यतीम यहाँ मज़हब की तलवार से,
ना जले कोई आशियाँ फिर नफ़रत के बाज़ार से।


शीर्षक: वतन के वास्ते

क्या हिन्दू, क्या मुसलमान—सबने जानें दी हैं वतन के वास्ते,
मैं इस बहस में ही क्यों पड़ूँ, जो बाँट दे दिल वतन के वास्ते।

खून से सींचा गया है ये चमन, हर रंग, हर एक जात का,
किस मुँह से तुम नफ़रत बोओगे इस पावन मिट्टी के वास्ते।

भगत सिंह, बिस्मिल, आज़ाद, अशफ़ाक़—हँसते-हँसते सूली चढ़ गए,
कौन था हिन्दू, कौन मुसलमान—किसे फुर्सत थी वतन के वास्ते।

अटल की वाणी, कलाम का सपना, गांधी का वो सत्य अहिंसा,
कितने दीप जलाए गए हैं अंधियारों से लड़ने के वास्ते।

न कोई बच्चा यतीम बने धर्म की इस अंधी जंग में,
न कोई घर जले फिर से मज़हब की झूठी आग के वास्ते।

मंदिरों में सिर झुकें अगर, तो मस्जिद में भी उठें दुआ के हाथ,
इंसानियत का हो एक मज़हब, इस हिंदुस्तान के वास्ते।

तू खुद से पूछ, ऐ इंसान—क्यों ज़हर उगलता है अपनों पर,
क्या तेरी रगों में बहता लहू नहीं है इस वतन के वास्ते?

मैं इस बहस में ही क्यों पड़ूँ, जो मेरा वतन तोड़ दे,
मेरा हर लफ़्ज़, हर साँस कुर्बान है इस वतन के वास्ते।


 with urdu gazal form 



क्या हिन्दू, क्या मुसलमाँ—ये जंग तुम्हारी साज़िश है,
वतन की मिट्टी रोती है, ये कैसी ख़ून की बारिश है।

मैं क्यों पड़ूँ उस बहस में जो नफ़रत को जन्म दे,
जो दिल को बाँटे, रूह को तोड़े—वो कैसी दानिश है?

भगत, बिस्मिल, आज़ाद, अशफ़ाक़—सबने हँसकर जान दी,
तुम बताओ, किस मज़हब की थी वो पाक सी ख़्वाहिश है?

तुमने मज़हब को ढाल बना कर तख़्त सजाए हैं,
ये इश्क़-ए-वतन नहीं साहब—ये सियासत की नुमाइश है।

अटल की ज़ुबां, कलाम का ख़्वाब, गांधी का सच कुचल दिया,
अब हर गली में नफ़रत बिकती—ये कैसी नई पैदाइश है?

कभी मंदिर जलते देखे, कभी मस्जिद पे वार हुआ,
ये किसका ख़ुदा खुश होगा—ये कैसी बंदिश है?

मासूमों के जिस्म जलाए, और नाम दिया तुमने “धर्म” उसे,
ये इबादत नहीं दरिंदगी है, ये रूह की साज़िश है।

ना कोई बच्चा यतीम बने, ना कोई माँ का आँचल जले,
वरना ये मुल्क नहीं रहेगा—सिर्फ़ लाशों की नुमाइश है।

तू खुद से पूछ ऐ इंसां—क्या तू ज़िंदा भी है या नहीं?
जो नफ़रत में डूबा हो पूरा—वो बस चलता फिरता ख़ारिश है।

मैं चुप नहीं अब बैठूँगा, मैं सच को खुलकर बोलूँगा,
जो वतन को बाँटने निकले—उनके खिलाफ़ ये बग़ावत की बारिश है।

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शीर्षक: वतन के वास्ते

क्या हिन्दू, क्या मुसलमान—सबने जानें दी हैं वतन के वास्ते,
मैं इस बहस में ही क्यों पड़ूँ, जो बाँट दे दिल वतन के वास्ते।

खून से सींचा गया है ये चमन, हर रंग, हर एक जात का,
किस मुँह से तुम नफ़रत बोओगे इस पावन मिट्टी के वास्ते।

भगत सिंह, बिस्मिल, आज़ाद, अशफ़ाक़—हँसते-हँसते सूली चढ़ गए,
कौन था हिन्दू, कौन मुसलमान—किसे फुर्सत थी वतन के वास्ते।

अटल की वाणी, कलाम का सपना, गांधी का वो सत्य अहिंसा,
कितने दीप जलाए गए हैं अंधियारों से लड़ने के वास्ते।

न कोई बच्चा यतीम बने धर्म की इस अंधी जंग में,
न कोई घर जले फिर से मज़हब की झूठी आग के वास्ते।

मंदिरों में सिर झुकें अगर, तो मस्जिद में भी उठें दुआ के हाथ,
इंसानियत का हो एक मज़हब, इस हिंदुस्तान के वास्ते।

तू खुद से पूछ, ऐ इंसान—क्यों ज़हर उगलता है अपनों पर,
क्या तेरी रगों में बहता लहू नहीं है इस वतन के वास्ते?

मैं इस बहस में ही क्यों पड़ूँ, जो मेरा वतन तोड़ दे,
मेरा हर लफ़्ज़, हर साँस कुर्बान है इस वतन के वास्ते।


Hardcore attack with urdu gazal 

शीर्षक: “मज़हब के सौदागर”

क्या हिन्दू, क्या मुसलमाँ—ये जंग तुम्हारी साज़िश है,
वतन की मिट्टी रोती है, ये कैसी ख़ून की बारिश है।

मैं क्यों पड़ूँ उस बहस में जो नफ़रत को जन्म दे,
जो दिल को बाँटे, रूह को तोड़े—वो कैसी दानिश है?

भगत, बिस्मिल, आज़ाद, अशफ़ाक़—सबने हँसकर जान दी,
तुम बताओ, किस मज़हब की थी वो पाक सी ख़्वाहिश है?

तुमने मज़हब को ढाल बना कर तख़्त सजाए हैं,
ये इश्क़-ए-वतन नहीं साहब—ये सियासत की नुमाइश है।

अटल की ज़ुबां, कलाम का ख़्वाब, गांधी का सच कुचल दिया,
अब हर गली में नफ़रत बिकती—ये कैसी नई पैदाइश है?

कभी मंदिर जलते देखे, कभी मस्जिद पे वार हुआ,
ये किसका ख़ुदा खुश होगा—ये कैसी बंदिश है?

मासूमों के जिस्म जलाए, और नाम दिया तुमने “धर्म” उसे,
ये इबादत नहीं दरिंदगी है, ये रूह की साज़िश है।

ना कोई बच्चा यतीम बने, ना कोई माँ का आँचल जले,
वरना ये मुल्क नहीं रहेगा—सिर्फ़ लाशों की नुमाइश है।

तू खुद से पूछ ऐ इंसां—क्या तू ज़िंदा भी है या नहीं?
जो नफ़रत में डूबा हो पूरा—वो बस चलता फिरता ख़ारिश है।

मैं चुप नहीं अब बैठूँगा, मैं सच को खुलकर बोलूँगा,
जो वतन को बाँटने निकले—उनके खिलाफ़ ये बग़ावत की बारिश ह 


🎤 शीर्षक: “मैं चुप नहीं रहूँगा”

क्या हिन्दू!… क्या मुसलमाँ!…
(ठहराव)
ये जंग नहीं—साज़िश है!
वतन की मिट्टी पूछ रही—
किसकी ये ख़ूनी बारिश है!

मैं क्यों पड़ूँ उस बहस में…
जो भाई को भाई से लड़वा दे!
जो दिल में ज़हर भर दे…
और मुल्क को टुकड़ों में बंटवा दे!!

भगत सिंह… बिस्मिल… आज़ाद… अशफ़ाक़!
(आवाज़ ऊँची)
हँसते-हँसते सूली चढ़ गए!!
तुम बताओ—किस मज़हब के थे वो?!
(तेज़)
या सिर्फ़ हिंदुस्तान के लिए मर गए?!

ये जो मज़हब के ठेकेदार हैं…
(तंज)
इनका ईमान किराए पर है!
कुर्सी के लिए बेच दें वतन—
इनका ख़ुदा भी सौदे पर है!!

अटल की आवाज़ दबा दी…
कलाम के ख़्वाब जला दिए…
गांधी का सच कुचल कर तुमने…
नफ़रत के महल बना दिए!!

कभी मंदिर जला… कभी मस्जिद टूटी…
(गुस्से में)
और तुम ताली बजाते रहे!
इंसानियत मरती रही सड़कों पे—
और तुम धर्म बचाते रहे!!

मासूमों के जिस्म जलाकर…
नाम दिया तुमने “धर्म” उसे?!
(कड़क)
शर्म नहीं आई ज़रा भी?!
या बेच दिया तुमने कर्म उसे?!

ना कोई बच्चा यतीम बने…
ना माँ का आँचल जले कभी…
वरना याद रखना—
ये देश नहीं बचेगा… बस राख बचेगी सभी!!

(धीरे से, फिर तेज़)
तू खुद से पूछ ऐ इंसान…
ज़िंदा है… या सिर्फ़ साँसें ले रहा है?
अगर नफ़रत ही तेरी पहचान है—
तो तू इंसान नहीं… बस एक लाश जी रहा है!!

(आखिरी दहाड़ 🔥)
मैं चुप नहीं रहूँगा!!
सच को खुले आम कहूँगा!!
जो वतन को बाँटने निकले—
(तेज़, जोर से)
मैं उनके खिलाफ़ आग बनकर दहकूँगा!!!

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