Monday, April 13, 2026

Kya mai insaan man h version

 


Mai inssan hu


Ya  Vaham palta hu insaniyat ka 


Khudgarji me janwar ban jata hu


 Fir bhi Mai kya insaan hu 


Bs baat hi karta hu aman chain ki


 Ropta asal me yudh ke beej hu 


Kya mai insan hu 


Apno ka hi sir kata h


 Apno ko hi jala ke mara hu


 Sajis bhi apno ke khilaf karta hu


 Fir bhi mai jhuthi hansi rakhta hu 


Har roz jalan ki aag me jalta hu 


  Apna zamir bechkar khud ko zinda rakhta hu Aise aise kaam jo janwar bhi na kare


 Unko karne se kahan darta hu


  Mai insaan hu 


kya wakai me insaan hu


Ret ke mahal aur 


Samsan ke andhere h 


Zinda ki shakl me murde tahal rahe hain 


Bheed me kayar bankar hatya kar balwan ban rahe h


Kya hum insan hai 


Ya iske hone ka vahan pal rahe h


Bs luta nocha aur hawas ki aag bhadka rahe h


Dikkawe kon zindagi aur 


Zindagi me dikhawa bana rahe 


Astin ke sapon ke bharose bharosa de rahe 


Har cheez me insaan hone ka haq gira rahe h


Kya mai insaan hu 


Isan hokar bhi maroge kutte ki maut chaurahe pe 


Fir bhi dhong dhokhe aur chaalbaazi ki misal hu 


Kya mai insaan hu 




Insaniyat jabtak dil me zinda h


Tak Tak insaan hu 


Warna Foonk diya jaunga ek din 


Fir bhi hawas ki aag me jalti ek laas hu


Urdu ke sath teekhi  gazal ke form me banao 


ग़ज़ल: “क्या मैं इंसान हूँ?” (Raakh)


वहम-ए-इंसानियत का चोग़ा ओढ़े मैं चल रहा हूँ

अपने ही साये के पीछे खुद से ही जल रहा हूँ


मैं अमन की ज़बान बोलकर बीज-ए-जंग बोता रहा

दिल के बाज़ार में हर रोज़ खुद को ही छल रहा हूँ


खून रिश्तों का भी मैंने ही अपने हाथों से किया

फिर भी आईने में हर बार “इंसान” बन निकल रहा हूँ


साज़िशों की राख में अपनी ही पहचान जला दी

मैं ही कातिल, मैं ही मसीहा—ये कैसा फल रहा हूँ


भीड़ में शामिल हूँ लेकिन भीड़ से भी गुमशुदा हूँ

ज़िंदा लाशों के शहर में मैं भी एक हलचल रहा हूँ


हवस की आग में जलकर भी बुझती नहीं ये रूह

रोज़ खुद की ही अदालत में मैं ही दलील-ए-कल रहा हूँ


अस्तीन के साँप भी अब अपना ही ख़ून पी रहे हैं

मैं भरोसे के जनाज़े पर बैठा इक पल रहा हूँ


क्या मैं इंसान हूँ? ये सवाल हर साँस में है

इंसानियत अगर दिल में है तो मैं अभी तक चल रहा हूँ


वरना जिस दिन बुझ गया ये अंदर का चराग़-ए-रूह

फिर मैं भी बस “राख” बनकर रास्तों में मिल रहा हूँ



Manch wali gazal ke form


मंच-ग़ज़ल: “क्या मैं इंसान हूँ?” (स्टेज वर्ज़न / ताली-तूफ़ान अंदाज़)


(धीमे सुर में शुरुआत… फिर तेज़ होता हुआ)


वहम-ए-इंसानियत का नक़ाब पहन के घूम रहा हूँ…

अपने ही ज़मीर की क़ब्र पे चैन से झूम रहा हूँ…


भीड़ में खड़ा हूँ, मगर भीड़ से भी अंजान हूँ…

हर साँस में सवाल है—क्या मैं इंसान हूँ?


(रुककर, दर्शकों की तरफ़ नज़र…)

बोलो! क्या मैं इंसान हूँ?


मैं अमन की बात करता हूँ… जंग के बीज बोता हूँ…

अपने ही घर की दीवारों में, आग रोज़ ढोता हूँ…


रिश्तों के खून से मैंने, अपनी तक़दीर लिखी…

और फिर आईने के आगे खड़ा—खुद को महान हूँ!

क्या मैं इंसान हूँ?


(तेज़ बीट की तरह शेर)

साज़िश मेरी रगों में है, और मुस्कान होठों पे…

क़ातिल भी मैं, मसीहा भी मैं—दोनों पहचान हूँ…


ज़मीर बेच के जो जिंदा है, वो जिंदा है या मरा?

मैं खुद ही अपने सवालों का सरेआम बयान हूँ…

क्या मैं इंसान हूँ?


(भीड़ से कॉल-एंड-रिस्पॉन्स)

बोलो ज़रा ज़ोर से! क्या मैं इंसान हूँ?


अस्तीन के साँपों से अब दोस्ती भी कर ली मैंने…

और अपने ही उजाले को अंधेरों में भर ली मैंने…


हवस की आग में जलकर भी बुझता नहीं ये सफ़र…

मैं राख भी हूँ, मैं शोला भी हूँ—अजीब दास्तान हूँ…


क्या मैं इंसान हूँ?


(अंतिम धीमा, फिर धमाका)

अगर दिल में इंसानियत है… तो शायद इंसान हूँ…

वरना जिस दिन ये बुझ गई… बस एक चलती लाश हूँ…


(रुककर फुसफुसाहट)

और आख़िरी बार पूछता हूँ…


क्या मैं इंसान हूँ?

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