Saturday, June 27, 2020

तुझसे मोहब्बत हुई तो राख हो जाऊंगा

अजीब रंग हैं दुनिया के
पर काट के , मस वरा उड़ने का देते हैं

तुझसे मोहब्बत हो गई तो बिखर जाऊंगा
इतना टूटूंगा की संवर जाऊंगा


परछाईं दिखती है तेरी हर एक चेहरे मे
ना जाने किन किन चेहरों में ढूंढ़ा है तुझे मैंने



तुझसे मोहब्बत हो गई तो बिखर जाऊंगा
इतना टूटूंगा की संवर जाऊंगा


परछाईं दिखती है तेरी हर एक चेहरे मे
ना जाने किन किन चेहरों में ढूंढ़ा है तुझे मैंने

बहुत खूबसूरत एहसास है—मैं इसे थोड़ा और धारदार, मंच योग्य और असरदार बनाता हूँ:

तुझसे मोहब्बत हो गई तो बिखर जाऊंगा,
इतना टूटूंगा कि खुद में ही निखर जाऊंगा।

तेरी चाहत का असर देख, ये हाल हुआ है,
खुद से दूर होकर भी तुझमें ही उतर जाऊंगा।

परछाईं दिखती है तेरी हर एक चेहरे में,
ना जाने किन-किन चेहरों में ढूंढ़ा है तुझे मैंने।

हर अजनबी में तेरा अक्स तलाशता रहा,
खुद को खोकर ही शायद तुझको पाया है मैंने।

अगर तुम चाहो तो मैं इसे ग़ज़ल फॉर्म, और आक्रामक अंदाज़, या तुम्हारे तखल्लुस (जैसे “राख़”) के साथ भी ढाल सकता हूँ।


Raakh takhalus ke sath aur आक्रामक 

ठीक है—अब इसे और आक्रामक, मंचीय और “राख़” तखल्लुस के साथ ढालते हैं:

तुझसे मोहब्बत हुई तो राख़ हो जाऊंगा,
मैं जलूंगा इस कदर कि आग हो जाऊंगा।

तू समझता है मुझे तोड़ के बिखरा देगा,
मैं वही टूट के हर बार नया हो जाऊंगा।

तेरी सूरत का नशा आँख पे ऐसा उतरा,
हर एक चेहरे में तेरा ही पता हो जाऊंगा।

तू मिला ना तो ये दुनिया भी जला दूंगा मैं,
अपने ही दर्द का चलता हुआ साज़ हो जाऊंगा।

परछाईं तेरी हर शख़्स में दिखती है मुझे,
कितनी सूरतों में तुझको मैं सजा हो जाऊंगा।

अब “राख़” नाम है मेरा तो ये अंजाम सही,
मैं जो बिखरा तो तेरे इश्क़ की हवा हो जाऊंगा।

अगर चाहो तो इसे मैं और भी तेज़, विद्रोही (revolutionary) या पूरी तरह मंच वाली ग़ज़ल (काफ़िया-रदीफ़ के साथ) में बदल सकता हूँ—बस बोलो कितना आग चाहिए 🔥


Tez aur vidrohi 

ठीक—अब इसे पूरी तरह तेज़, विद्रोही और मंच पर गूंजने वाला बनाते हैं, “राख़” के तेवर के साथ:

तुझसे मोहब्बत हुई तो सज़ा हो जाऊंगा,
मैं वो चीख़ हूँ जो हर दिल में गूंजा हो जाऊंगा।

तूने सोचा था मुझे तोड़ के खत्म कर देगा,
मैं वही राख़ हूँ, हर बार धधकता हो जाऊंगा।

तेरी यादों को मैं सीने में नहीं रखता अब,
मैं उन्हें आग बनाकर ही हवा हो जाऊंगा।

हर एक चेहरे में तेरी झलक दिखती है मुझे,
इस भीड़ से लड़ के तेरा आईना हो जाऊंगा।

तू नहीं है तो ये दुनिया भी मेरे किस काम की,
मैं तेरे नाम पे जलकर ही धुआं हो जाऊंगा।

अब “राख़” नाम है मेरा, तो बगावत भी सुन,
तेरे इश्क़ में नहीं—मैं खुद खुदा हो जाऊंगा।




No comments:

Post a Comment