Monday, April 13, 2020

ये बात कुछ और है
वो बात कुछ और थी
एक लंबा लम्हा गुजरा ज़िन्दगी का
ये समझने में
वो और बात क्या थी

चले आए तुम  अपनी तनहाई लेकर
मै अपना गम लेकर उनसे मिला
दोनों मिले एक हमसफ़र मिला
ना उसकी तन्हाई रही ना मेरे गम कोई पता मिला

दूप-२ जलते बल्ब की सी मेरी ज़िन्दगी
वेंटिलेटर पे पड़े मरीज़ सी मेरी जिंदगी
वो अयी मुस्कुराई पास बैठी मेरी ज़िन्दगी
मै चाह रहा था वो मेरा ऑक्सीजन सिलिंडर खींच ले
बंद करदे सांस रोक दे मेरी ज़िन्दगी

ये पूरी रात हमसे सोई ना गई की
हसने  कीमत इतनी  चुकाई गई


 बात कुछ और है
वो बात कुछ और थी
एक लंबा लम्हा गुजरा ज़िन्दगी का
ये समझने में
वो और बात क्या थी

चले आए तुम  अपनी तनहाई लेकर
मै अपना गम लेकर उनसे मिला
दोनों मिले एक हमसफ़र मिला
ना उसकी तन्हाई रही ना मेरे गम कोई पता मिला

दूप-२ जलते बल्ब की सी मेरी ज़िन्दगी
वेंटिलेटर पे पड़े मरीज़ सी मेरी जिंदगी
वो अयी मुस्कुराई पास बैठी मेरी ज़िन्दगी
मै चाह रहा था वो मेरा ऑक्सीजन सिलिंडर खींच ले
बंद करदे सांस रोक दे मेरी ज़िन्दगी

ये पूरी रात हमसे सोई ना गई की
हसने  कीमत इ
तनी  चुकाई गई



तुम्हारी रचना में दर्द, तन्हाई और एक खतरनाक-सी चाहत का गहरा रंग है — मैं इसे थोड़ा तराशकर, लय और असर को और धार दे देता हूँ, ताकि मंच पर भी ताली पड़े 👇

बात कुछ और है — (तख़ल्लुस: "राख़")

बात कुछ और है, वो बात कुछ और थी,
एक उम्र गुज़र गई ये समझने में —
कि वो "और" बात क्या थी।

चले आए तुम अपनी तन्हाई उठाए,
मैं अपना ग़म सीने से लगाए मिला,
दो जख़्म मिले तो हमसफ़र बन बैठे,
ना तेरी तन्हाई रही, ना मेरा ग़म रहा।

दो-दो जलते बल्बों सी ये ज़िन्दगी मेरी,
टिमटिमाती, बुझती — बेहिसाब अंधेरों में,
वेंटिलेटर पे पड़े मरीज़ सी साँसें मेरी,
हर धड़कन जैसे उधार हो गैरों में।

वो आई... मुस्कुराई... पास बैठ गई,
जैसे मौत भी कभी रहम खा जाती है,
मैं चाहता था वो ऑक्सीजन ही खींच ले,
कम-से-कम ये उधारी साँस तो छूट जाती है।

ये पूरी रात हमसे सोई ना गई,
हँसने की कीमत बहुत भारी चुकाई गई,
होठों पे मुस्कान रखी थी बस दिखावे को,
अंदर से हर खुशी किस्तों में गँवाई गई।

"राख़" कहता है —
ये जो ज़िन्दगी है ना...
ये जीने से ज़्यादा,
धीरे-धीरे मरने की सज़ा लगती है।



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