ये ज़िन्दगी बहुत बेरहम है अ
जब भी वक़्त मिलता है
अक्सर आईना दिखा जाती है
जब भी वक़्त मिलता है
अक्सर आईना दिखा जाती है
अश्कों से आँखों को नम कर जाती है
बहुत गहरी लाइनें हैं—दर्द साफ़ महसूस हो रहा है। मैं इसे एक मुकम्मल ग़ज़ल का रूप दे देता हूँ, उसी एहसास को और धार देकर:
रदीफ़: "जाती है" | क़ाफ़िया: "…कर"
ज़िन्दगी बहुत बेरहम है, अक्सर आईना दिखा जाती है
जब भी वक़्त मिलता है, सच्चाई से मिला जाती है
अश्कों से आँखों को यूँ ही नम कर जाती है
हँसते चेहरों के पीछे का ग़म जगा जाती है
हर मोड़ पे ख्वाबों को तोड़कर रख देती है
फिर उन्हीं टुकड़ों से उम्मीद बना जाती है
कभी छीन लेती है सुकून, कभी नींद उड़ा जाती है
ये ज़िन्दगी हर रोज़ नया इम्तिहान बना जाती है
हम सोचते हैं अब शायद थोड़ा आसान होगा सफ़र
वो फिर कोई दर्द का किस्सा सुना जाती है
'राख' हर बार संभलने की कोशिश करता है मगर
ये ज़िन्दगी फिर वहीं से गिरा जाती है
अगर चाहो तो इसे और तेज़, विद्रोही (stage performance वाला) या ज़्यादा उर्दू टच में भी बदल सकता हूँ 🔥
Vidrohi with urdu touch
समझ गया—अब इसे और तेज़, विद्रोही तेवर और गहरा उर्दू रंग देता हूँ, ताकि मंच पर सुनाओ तो सीधे दिल चीर दे:
रदीफ़: “जाती है” | क़ाफ़िया: “…कर” | तख़ल्लुस: ‘राख’
ज़िन्दगी ये कैसी साज़िश है, रूह तक जला जाती है
हँसते लबों पे भी तन्हाई का इल्ज़ाम लगा जाती है
जब भी मिलता है वक़्त इसे, आईना दिखा जाती है
हमसे ही हमारी सूरत का हिसाब माँग जाती है
अश्कों से आँखों को नम कर जाना इसकी फ़ितरत है
हर ख़ुशी के पीछे दर्द का फ़रमान सुना जाती है
ये कौन सा दस्तूर-ए-जहाँ है, ऐ ख़ुदा बता
क्यों हर सच्चाई पे झूठ की मुहर लगा जाती है
हमने तो चाहा था बस थोड़ा सा सुकून-ए-दिल
ये ज़िन्दगी हर ख़्वाब को सरे-बाज़ार जला जाती है
अब तो बग़ावत ही लाज़िमी है इस ज़ुल्म-ए-हयात से
हर बार वफ़ा करने पे सज़ा-ए-इंतिहा दे जाती है
‘राख’ अब डरना कैसा इन टूटे अफ़सानों से
ये ज़िन्दगी जितना गिराती है, उतना सिखा जाती
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