बन के आवारा मै
रातों को भारत देखा
गली कुचों पे सड़कों पे
मैंने शमशान सा सन्नाटा देखा
A .C . के बड़े घरों में
लोगों को सोते देखा
सड़क किनारे सोतों को
कारों से कुचले देखा
सूखे हड्डी के पिंजड़ों को
मैंने जीवन खोते देखा
रोटी के एक कतरे की खातिर
कुत्तों औ इंसानों को लड़ते देखा
वहीँ सामने गलियारे में
सुन्दर मयखाना देखा
लाखों का वारा न्यारा होता
ये घंटे भर में देखा
मयखाने में जाती नगर वधू पे
मैंने लाखों लूटते देखा
वहीँ किनारे पड़े आकुलाते
भूखों को मैंने दुरियाते देखा
कुछ मासूमों को मैंने
राहों में भटकते देखा
कुछ को रोते देखा
कुछ को बिकते देखा
सड़कों पे शहजादों को
मैंने खूब पीते देखा
वहीँ बड़ी कारों में अबला की
अस्मत को लुटते देखा
कुछ सरकार के रखवालों को
मैंने मुंह घुमाते देखा
कुछ को पैसे लेते देखा
कुछ को पीठ थपथपाते देखा
वहीँ सामने चौराहे पे
मैंने गाँधी का पुतला देखा
मजबूरी का नाम महात्मा गाँधी
ये उसको कहते देखा
रातों को अंधियारे में
मैंने हर मंजर देखा
कहीं जश्न तो कहीं
मातम का माहौल को देखा
सच कहूं तो मैंने
रातों का भारत देखा
और इस भारत को मैंने
यूँही आगे बढते देखा
मैंने रातों का भारत देखा...
गर्व करूँ किस भारत पर
जब मैंने अतीत के भारत को
इस भारत का चमचा देखा
संस्कारों को मिटते देखा
अच्छाई का दम घुटते देखा
हाँ उस गौरवशाली भारत को
रातों में मरते देखा
हाँ मैंने रातों का भारत देखा
हाँ मैंने रातों का भारत देखा
...............................धर्मेन्द्र
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